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कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य का संकट: 42 प्रतिशत कर्मचारी कार्य-जीवन संतुलन की कमी से तनावग्रस्त

सर्वेक्षण में सामने आई कर्मचारियों की चिंता; 33 प्रतिशत लोगों को मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बोलने से करियर प्रभावित होने का डर, कंपनियों के सामने संवेदनशील कार्य-संस्कृति विकसित करने की चुनौती

mental health in work place is detreating
mental health in work place is detreating · Gemini Ai


आधुनिक कार्यस्थलों पर बढ़ता काम का दबाव, लंबे कामकाजी घंटे और निजी जीवन के लिए समय की कमी कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर सामने आए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 42 प्रतिशत कर्मचारी कार्य-जीवन संतुलन की कमी के कारण तनाव का सामना कर रहे हैं। वहीं, लगभग 33 प्रतिशत कर्मचारियों को आशंका है कि यदि वे कार्यालय में अपनी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों पर खुलकर चर्चा करेंगे, तो उनके करियर या भविष्य में मिलने वाले अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

ये आंकड़े कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने और कर्मचारियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। हालांकि, संबंधित सर्वेक्षण का नाम, नमूने का आकार और अध्ययन क्षेत्र स्पष्ट होने पर इन आंकड़ों की व्यापकता का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा।

कार्य-जीवन संतुलन क्यों बन रहा है चुनौती?

आज अनेक क्षेत्रों में कर्मचारियों से कम समय में अधिक काम पूरा करने की अपेक्षा की जाती है। लगातार बैठकों, समय-सीमाओं, अतिरिक्त जिम्मेदारियों और काम के बाद भी संदेशों का जवाब देने की संस्कृति के कारण निजी जीवन प्रभावित हो सकता है।

जब कर्मचारियों को पर्याप्त आराम, परिवार के साथ समय और व्यक्तिगत गतिविधियों के लिए अवसर नहीं मिलता, तो थकान, चिड़चिड़ापन, नींद में परेशानी और काम में एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

विशेष रूप से घर से काम करने या मिश्रित कार्य व्यवस्था में कार्यालय और निजी जीवन की सीमाएं धुंधली हो सकती हैं। यदि कर्मचारी हर समय उपलब्ध रहने का दबाव महसूस करता है, तो तनाव लंबे समय तक बना रह सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर बोलने से क्यों डरते हैं कर्मचारी?

सर्वेक्षण में शामिल लगभग 33 प्रतिशत कर्मचारियों की चिंता कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक की ओर संकेत करती है। कुछ लोगों को लगता है कि तनाव, चिंता या भावनात्मक परेशानी साझा करने से उन्हें कमजोर कर्मचारी समझा जाएगा अथवा पदोन्नति और नई जिम्मेदारियों के अवसर कम हो जाएंगे।

इस तरह की आशंकाएं कर्मचारियों को समय पर सहायता लेने से रोक सकती हैं। परिणामस्वरूप, समस्या बढ़ने के बाद ही वे चिकित्सकीय परामर्श या अवकाश लेने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

कार्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत का अर्थ कर्मचारियों की निजी जानकारी सार्वजनिक करना नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसा भरोसेमंद वातावरण बनाना है, जहां जरूरत पड़ने पर व्यक्ति बिना भेदभाव के सहायता मांग सके।

कंपनियों और प्रबंधकों की क्या है जिम्मेदारी?

कंपनियां मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल कार्य-संस्कृति विकसित करने के लिए कई कदम उठा सकती हैं:

  • काम के घंटे और जिम्मेदारियां व्यावहारिक रखें।
  • कर्मचारियों को नियमित अवकाश लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • आवश्यकता के अनुसार परामर्श सेवाएं और कर्मचारी सहायता कार्यक्रम उपलब्ध कराएं।
  • प्रबंधकों को तनाव के संकेत पहचानने और संवेदनशील संवाद करने का प्रशिक्षण दें।
  • मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की गोपनीयता बनाए रखें और भेदभाव से बचें।


विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण संदेश

मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कार्यस्थल की परिस्थितियों से भी जुड़ा विषय है। कर्मचारियों को तनाव से निपटने के उपाय बताना उपयोगी है, लेकिन अत्यधिक कार्यभार, अनुचित समय-सीमाओं और असुरक्षित वातावरण जैसी मूल समस्याओं का समाधान करना भी आवश्यक है।

मुख्य संदेश: “स्वस्थ कर्मचारी केवल बेहतर काम ही नहीं करते, बल्कि एक अधिक सहयोगी और टिकाऊ कार्य-संस्कृति बनाने में भी योगदान देते हैं।”

यह लेख का सार प्रस्तुत करने वाला कथन है, किसी विशेषज्ञ का प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं।

भविष्य की दिशा: संवेदनशील और सहयोगी कार्यस्थल

आने वाले समय में कंपनियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य को कर्मचारी कल्याण की नियमित नीतियों का हिस्सा बनाना महत्वपूर्ण होगा। लचीले कामकाजी घंटे, उचित अवकाश, गोपनीय परामर्श और निष्पक्ष पदोन्नति व्यवस्था कर्मचारियों का भरोसा बढ़ा सकती है।

इसके साथ ही, कंपनियों को कर्मचारियों से नियमित प्रतिक्रिया लेनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि लागू की गई नीतियों से तनाव, अनुपस्थिति तथा कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की प्रवृत्ति में कोई सुधार हो रहा है या नहीं।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर होने वाले जागरूकता कार्यक्रम तभी सार्थक होंगे, जब उनका प्रभाव वर्ष भर कार्यस्थलों की वास्तविक नीतियों और व्यवहार में दिखाई दे।

निष्कर्ष

कार्य-जीवन संतुलन की कमी और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने का डर आधुनिक कार्यस्थलों की गंभीर चुनौतियां हैं। सर्वेक्षण में सामने आए 42 प्रतिशत और 33 प्रतिशत के आंकड़े इस विषय पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता दर्शाते हैं, हालांकि उनकी पुष्टि के लिए मूल सर्वेक्षण का विवरण जरूरी है।

कर्मचारियों को सुरक्षित वातावरण, उचित कार्यभार और सहायता उपलब्ध कराना कंपनियों की प्राथमिकता होनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य का अभिन्न हिस्सा समझना ही स्वस्थ, उत्पादक और मानवीय कार्यस्थलों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।