ब्रेकिंग न्यूज

तिरंगे की राजनीति और सीजेपी का विरोध: ‘झंडा फहराओ’ अभियान के जवाब में हिंदुत्ववादी संगठनों की सक्रियता से दिल्ली में सेहमा सीजेपी

सीजेपी के ‘लहरा दो तिरंगा’ अभियान के बीच दक्षिणपंथी समूहों की जवाबी लामबंदी, प्रदर्शनकारियों पर हमले के आरोप और सरकार समर्थक नारों ने लोकतांत्रिक विरोध, राष्ट्रभक्ति तथा कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ी।

CJP being countered by Hindu right wing
CJP being countered by Hindu right wing · chat gpt AI

सीजेपी के ‘लहरा दो तिरंगा’ अभियान के बीच दक्षिणपंथी समूहों की जवाबी लामबंदी, प्रदर्शनकारियों पर हमले के आरोप और सरकार समर्थक नारों ने लोकतांत्रिक विरोध, राष्ट्रभक्ति तथा कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ी।

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय ध्वज भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता और संवैधानिक एकता का प्रतीक है। लेकिन जब तिरंगा किसी राजनीतिक आंदोलन के केंद्र में आ जाता है, तब उसके साथ जुड़े संदेश, विरोध के तरीके और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी व्यापक बहस का विषय बन जाती हैं। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में चल रहे विरोध आंदोलन और उसके जवाब में दक्षिणपंथी संगठनों तथा सरकार समर्थक समूहों की सक्रियता ने इसी सवाल को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

सीजेपी और उससे जुड़े छात्र संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तथा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के विरोध में तिरंगा फहराने का अभियान शुरू किया। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता की रक्षा का संघर्ष है। दूसरी ओर, चुनावी प्रक्रिया का बचाव करने वाले पक्षों ने विपक्ष के आरोपों पर सवाल उठाए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया पर लगाए गए आरोपों को खारिज किया है, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे हैं, वे दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं।

इस राजनीतिक टकराव के बीच दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों को धमकाने तथा उन पर हमला करने की घटनाएं भी सामने आईं। इससे सवाल उठने लगा कि क्या वैचारिक असहमति अब सड़क पर शक्ति-प्रदर्शन का रूप ले रही है।

1. ‘लहरा दो तिरंगा’ अभियान की पृष्ठभूमि

सीजेपी का विरोध केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं है। आंदोलन का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका है। प्रदर्शनकारी चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच और चुनाव आयोग की जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

अक्टूबर में सीजेपी तथा कुछ छात्र संगठनों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की कोशिश की। प्रशासन ने निर्धारित नियमों और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी। बाद में जंतर-मंतर को नियमित विरोध-स्थल के रूप में अधिसूचित व्यवस्था से हटाने और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थलों पर अनुमति लेकर प्रदर्शन करने की व्यवस्था सामने आई।

13 अक्टूबर को सीजेपी के कुछ कार्यकर्ता जंतर-मंतर में प्रवेश कर तिरंगा लहराते हुए नारे लगाने लगे। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया। सीजेपी ने इस कार्रवाई को विरोध के अधिकार पर अंकुश बताया, जबकि पुलिस ने प्रतिबंधों और पहले से दिए गए आश्वासनों के उल्लंघन का हवाला दिया।

इसके बाद आंदोलन ने ‘लहरा दो तिरंगा’ का रूप लिया। 16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क के आसपास तिरंगा मार्च आयोजित करने का आह्वान किया गया। प्रशासन ने कार्यक्रम पर रोक लगाई और इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी। सीजेपी का कहना था कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने और शांतिपूर्ण विरोध करने के अधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

2. जवाबी लामबंदी: हिंदुत्ववादी समूहों की भूमिका

सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले सामाजिक माध्यमों पर विरोध के जवाब में बड़े पैमाने पर जुटने की अपीलें सामने आईं। कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं और डिजिटल मंचों ने हिंदू संगठनों से आंदोलन का मुकाबला करने के लिए जुटने का आह्वान किया। हालांकि, कुछ संगठनों ने ऐसी लामबंदी से अपना संबंध होने से इनकार भी किया।

8 अक्टूबर को प्रकाशित न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक माध्यमों पर बड़ी संख्या में कथित राष्ट्रवादी प्रदर्शनकारियों के जुटने के दावे प्रसारित किए जा रहे थे। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़ी ओर से ऐसी लामबंदी के दावों को लेकर इनकार सामने आया था।

इसलिए यह कहना कि सभी हिंदुत्ववादी संगठनों ने मिलकर कोई एक आधिकारिक जवाबी अभियान चलाया, उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं होता। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि सीजेपी के आंदोलन के विरुद्ध कुछ दक्षिणपंथी समूहों और ऑनलाइन प्रभावशाली खातों ने जवाबी लामबंदी की अपील की, जबकि संगठनों की औपचारिक भागीदारी को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए।

3. प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों पर हमले के आरोप

10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस तथा नगर निगम के सिविक सेंटर के आसपास प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार तथा मारपीट की खबरें सामने आईं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ लोगों ने स्वयं को बजरंग दल से जुड़ा बताया और पत्रकारों को धमकाया। समाचार रिपोर्टों में पुलिस की मौजूदगी में प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट किए जाने का भी उल्लेख किया गया।

दिल्ली पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में लेने की जानकारी दी। कुछ गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के बारे में पुलिस ने बताया कि उन्होंने स्वयं को हिंदू रक्षा दल से जुड़ा बताया था। टेलीग्राफ की रिपोर्ट में हिंदू रक्षा दल की ओर से हमलों की जिम्मेदारी लेने के दावे का भी उल्लेख किया गया।

इन घटनाओं के संदर्भ में दो सावधानियां आवश्यक हैं। पहली, किसी व्यक्ति का किसी संगठन से जुड़ा होने का दावा अपने आप में उस संगठन की औपचारिक जिम्मेदारी सिद्ध नहीं करता। दूसरी, आरोपों, पुलिस की कार्रवाई और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्यों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।

फिर भी, यदि किसी प्रदर्शनकारी या पत्रकार पर केवल उसकी राजनीतिक राय या रिपोर्टिंग के कारण हमला होता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। शांतिपूर्ण विरोध करने वालों की सुरक्षा और पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर देना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

4. 16 अक्टूबर: तिरंगा मार्च और सरकार समर्थक जवाबी नारे

16 अक्टूबर को सीजेपी ने कनॉट प्लेस में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया। दिल्ली पुलिस ने कार्यक्रम को अनुमति नहीं दी और निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए आयोजकों को चेतावनी दी। सेंट्रल पार्क बंद रखा गया तथा क्षेत्र में भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए।

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और छात्र नेता नेहा बोरा सहित कई लोगों को हिरासत में लिया गया। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारी अलग-अलग स्थानों पर जुटे और तिरंगे के साथ चुनाव आयोग तथा मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध नारे लगाए।

इसी दौरान पालिका बाजार के पास कुछ दुकानदारों ने सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में नारे लगाए। द ट्रिब्यून की 17 अक्टूबर की रिपोर्ट ने इसे प्रदर्शनकारियों के नारों के जवाब में हुए एक जवाबी प्रदर्शन के रूप में दर्ज किया। इस घटनाक्रम से स्पष्ट हुआ कि विवाद केवल प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच नहीं रहा, बल्कि सार्वजनिक स्थान पर राजनीतिक संदेशों की प्रतिस्पर्धा भी दिखाई देने लगी।

हालांकि, सरकार समर्थक नारे लगाने वाले सभी दुकानदारों को किसी विशिष्ट हिंदुत्ववादी संगठन का सदस्य मानने का आधार उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं मिलता। इसलिए जवाबी नारों की घटना और 10–11 अक्टूबर को सामने आए कथित हमलों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

5. चुनावी पारदर्शिता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता है। सीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ियों के कारण पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वे मुख्य चुनाव आयुक्त से जवाबदेही और इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

इसके विपरीत, निर्वाचन आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे हैं, वे पुनः पंजीकरण करा सकते हैं। भाजपा ने भी आंदोलनकारियों के आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।

इन परस्पर विरोधी दावों का समाधान नारों या सड़क पर शक्ति-प्रदर्शन से नहीं, बल्कि सत्यापन योग्य आंकड़ों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और स्वतंत्र जांच से होना चाहिए। कितने नाम हटाए गए, कितने हटाने के निर्णय उचित थे, कितने पात्र मतदाताओं को दोबारा पंजीकरण में कठिनाई हुई और शिकायतों का निपटारा कैसे हुआ—ये ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर दस्तावेजों और विश्वसनीय आंकड़ों से मिलने चाहिए।

6. राष्ट्रभक्ति का अधिकार किसके पास?

तिरंगे को लेकर पैदा हुआ विवाद एक व्यापक संवैधानिक प्रश्न उठाता है: क्या राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति का कोई एक राजनीतिक स्वरूप हो सकता है?

तिरंगा किसी एक दल, संगठन, विचारधारा या सरकार का प्रतीक नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन में राष्ट्रीय ध्वज लेकर चलना अपने आप में किसी व्यक्ति की राजनीतिक निष्ठा या राष्ट्रविरोधी मंशा का प्रमाण नहीं बनता। इसी प्रकार, सरकार के समर्थन में नारे लगाना भी अपने आप में किसी व्यक्ति को हिंसक या असंवैधानिक नहीं बनाता।

लोकतंत्र में सरकार का समर्थन करना, सरकार की आलोचना करना और चुनाव आयोग से सवाल पूछना—तीनों के लिए स्थान होना चाहिए। असहमति का मूल्यांकन उसके तथ्यों, तरीकों और कानून के पालन के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल इस आधार पर कि कौन-सा पक्ष तिरंगा लेकर खड़ा है।

भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार प्रदान करता है। ये अधिकार कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। इसलिए आयोजकों को वैध अनुमति और लागू निर्देशों का पालन करना चाहिए, जबकि प्रशासन को प्रतिबंधों को आवश्यक, उचित और समान रूप से लागू करना चाहिए।

7. पुलिस की भूमिका और जवाबदेही

दिल्ली पुलिस का तर्क है कि कनॉट प्लेस जैसे व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में बिना अनुमति भीड़ जुटने से यातायात, कारोबार, आपातकालीन सेवाओं और सार्वजनिक सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। पुलिस ने पूर्व प्रदर्शनों में कथित नियम उल्लंघन और हिंसा की आशंका को भी अपनी कार्रवाई का आधार बताया।

दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया है कि यदि किसी क्षेत्र में तिरंगा लहराने और शांतिपूर्ण सभा की अनुमति नहीं दी जाती, तो उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कैसे होगी।

इन दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की परीक्षा है। निषेधाज्ञा लागू होने पर पुलिस कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है, लेकिन किसी भी कार्रवाई में आवश्यकता, अनुपात और जवाबदेही का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी प्रकार, प्रदर्शनकारियों को भी हिंसा, संपत्ति को नुकसान और कानूनसम्मत निर्देशों की अवहेलना से बचना चाहिए।

पत्रकारों पर हमले या उन्हें धमकाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है। पुलिस की मौजूदगी में यदि हिंसा होती है, तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त थी या नहीं और कार्रवाई सभी पक्षों के विरुद्ध समान रूप से हुई या नहीं।

8. सामाजिक माध्यम, अफवाहें और राजनीतिक ध्रुवीकरण

इस विवाद में सामाजिक माध्यमों ने दोहरी भूमिका निभाई है। एक ओर, वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों की रिपोर्टों ने घटनाओं को सार्वजनिक चर्चा में लाने में मदद की। दूसरी ओर, भ्रामक वीडियो, अपुष्ट दावे और आक्रामक भाषा से तनाव बढ़ने का खतरा भी पैदा हुआ।

17 अक्टूबर की इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार, तिरंगा मार्च से संबंधित घटनाओं के बाद पुलिस ने कई प्राथमिकी दर्ज कीं और कुछ सामाजिक माध्यम खातों के विरुद्ध कार्रवाई की। रिपोर्ट में कथित रूप से भ्रामक सामग्री और अशांति भड़काने वाली सामग्री की जांच का भी उल्लेख किया गया।

किसी वीडियो को साझा करने से पहले उसकी तारीख, स्थान, मूल स्रोत और संदर्भ की पुष्टि करना जरूरी है। पुराने वीडियो को नई घटना बताना, किसी व्यक्ति की पहचान बिना पुष्टि के उजागर करना या किसी पूरे धार्मिक समुदाय को दोषी ठहराना वास्तविक स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे वायरल सामग्री को तथ्य-जांच के बाद प्रकाशित करें और आरोपों को स्पष्ट रूप से आरोप के रूप में ही प्रस्तुत करें।

9. आगे क्या हो सकता है?

इस विवाद का भविष्य कई बातों पर निर्भर करेगा। पहला, क्या चुनावी पुनरीक्षण से जुड़े सवालों का उत्तर पारदर्शी आंकड़ों और शिकायत-निवारण के माध्यम से दिया जाता है? दूसरा, क्या प्रदर्शनकारियों को वैध अनुमति के साथ विरोध करने के लिए व्यावहारिक अवसर मिलते हैं? तीसरा, क्या हिंसा और धमकी के आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है? और चौथा, क्या राजनीतिक संगठन अपने समर्थकों को शांति बनाए रखने की स्पष्ट अपील करते हैं?

यदि इन प्रश्नों का समाधान संस्थागत स्तर पर होता है, तो तनाव कम किया जा सकता है। लेकिन यदि विवाद को केवल राष्ट्रभक्ति बनाम राष्ट्रविरोध के रूप में पेश किया गया, तो चुनावी जवाबदेही पर मूल बहस पीछे छूट सकती है और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

निष्कर्ष

सीजेपी का ‘लहरा दो तिरंगा’ अभियान और उसके जवाब में सामने आई दक्षिणपंथी लामबंदी भारतीय लोकतंत्र के सामने एक कठिन चुनौती प्रस्तुत करती है। यह चुनौती केवल इस बात की नहीं है कि किसे कहां तिरंगा फहराने दिया जाए, बल्कि इस बात की भी है कि राजनीतिक असहमति, सार्वजनिक सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान केवल उसे हाथ में उठाने से नहीं, बल्कि उन संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करने से भी जुड़ा है जिनका वह प्रतीक है—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। किसी भी पक्ष की हिंसा, धमकी या बिना प्रमाण लगाए गए सामूहिक आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

लोकतंत्र में तिरंगा किसी पक्ष की जीत का हथियार नहीं, बल्कि उन सभी नागरिकों की साझा पहचान है जिन्हें शांतिपूर्ण ढंग से सवाल पूछने, जवाब मांगने और अपनी बात रखने का अधिकार है।