कोरोना का कहर भाजपा में जीत का जुनून और कांग्रेस में हार की हताशा

देवदत्त दुबे।
भोपाल। एक तरफ जहां कोरोना का कहर बढ़ रहा है। वही भाजपा उपचुनाव में मिली जीत के जुनून में है। तो कांग्रेस में हार की हताशा साफ देखी जा रही है। ऐसे में आम आदमी ना केवल अपने बल्कि व्यापार व्यवसाय नौकरी और बच्चों के भविष्य को लेकर सशंकित है। दरअसल 1 वर्ष पूर्व चीन से कोरोना वायरस की शुरुआत हुई जो कि पूरे दुनिया में कहर बनी। पिछले 2 महीने धीमी रफ्तार के बाद एक बार फिर कोरोना महामारी कहर बरपा ना शुरू कर दिया है। पूरे देश में नए सिरे से लॉकडाउन बंद कर्फ्यू लगाए जाने की चर्चा जोर पकड़ने लगी है ।अहमदाबाद मैं 3 दिन के कर्फ्यू के ऐलान के बाद प्रदेश में भी चर्चाओं का बाजार गर्म रहा हालांकि दोपहर बाद सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए केवल 5 दिनों में रात्रिकालीन कर्फ्यू का ऐलान किया है।
बहरहाल प्रदेश में भी कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी है ।जिसके कारण सरकार सतर्क और सजग हो गई है। पिछले 24 घंटे में ही 15 से 28 मरीज मिले। तीसरी लहर में राजधानी भोपाल में तेजी से संक्रमित मरीजों की संख्या सामने आ रही है। पिछले 24 घंटों में प्रदेश में 15 नए संक्रमित मरीज मिले हैं वही 9 मरीजों की मौत हो गई है। यही कारण है कि राज्य सरकार सतर्क और सजग हो गई है। मुख्यमंत्री चौहान ने वल्लभ भवन में समीक्षा बैठक बुलाई और प्रदेश के 5 जिलों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, रतलाम और विदिशा में 21 नवंबर से रात्रि कालीन कर्फ्यू लगाने का ऐलान किया है।
लेकिन जिस तरह से कोरोना कॉल में भी राजनीतिक दलों की गतिविधियां निरंतर चलती रही वह अभी भी जारी है। फर्क सिर्फ यह है कि भाजपा जहां उपचुनाव में मिली जीत से उत्साहित है, वही कांग्रेसी खेमे में हताशा है। भाजपा के उत्साह का सबसे बड़ा कारण यह है कि एक बार फिर पार्टी कार्यकर्ताओं ने सिद्ध कर दिया है कि पार्टी में कोई भी आकर चुनाव लड़ जाए और कितनी ही विपरीत लहर हो इसके बावजूद कार्यकर्ता अपना-अपना बूथ जिताकर कार्यकर्ता अंततः चुनाव जिता ही देता है । क्योंकि कांग्रेसी भाजपा में आकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यही थी कि जिनके खिलाफ 2 साल पहले 2018 में चुनाव लड़ कर चुनाव जीते हैं । अब उनके समर्थन से चुनाव कैसे जीता जाएगा लेकिन संगठन और संघ के दबाव में अधिकांश सीटों पर पार्टी कार्यकर्ता जीत के लिए एकजुट रहे और इसी माहौल को बनाए रखने के लिए पार्टी प्रशिक्षण मंडल स्तर पर देने जा रही है ।वहीं दूसरी ओर सत्ता में वापसी की आस लगाए कांग्रेस को इन उप चुनाव परिणाम से तगड़ा झटका लगा है। पार्टी नेताओं का गुस्सा अब सोशल मीडिया पर भी दिखने लगा है। पार्टी में नए सिरे से संगठन स्तर पर जमावट की मांग उठने लगी है। प्रदेश अध्यक्ष या फिर नेता प्रतिपक्ष में से कोई एक पद कमलनाथ छोड़ने वाले हैं जिसको लेकर भी लॉबिंग शुरू हो गई है। पार्टी ने 2018 के विधानसभा चुनाव के तर्ज पर उप चुनाव के पहले भी 28 विधानसभा क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले जिलों में पदाधिकारियों की नियुक्तियां की थी। लेकिन पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ इस कारण इनको भी निरस्त करने की मांग पार्टी में उठ रही है ।पार्टी कार्यकर्ताओं को नगरी निकाय और पंचायती राज के होने वाले चुनाव की भी चिंता सताने लगी है यही कारण है के पार्टी का एक बड़ा तबका इन परिणामों से हताश हो रहा है हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने साफ शब्दों में कहा है कि वे प्रदेश में ही रह कर कार्यकर्ताओं के साथ संघर्ष करेंगे और प्रदेश के हित में अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।
कुल मिलाकर आम आदमी के बीच जहां कोरोना का कहर फिर से बरपना शुरू हो गया है वही राजनीतिक दलों की गतिविधियां उपचुनाव के परिणामों से प्रभावित होकर चल रही है।

(सम्पूर्ण माया पत्रिका व वेबसाइटस में खबरे प्रकाश हेतु समपर्क करे ब्यूरो प्रमुख मध्य प्रदेश श्री देवदत्त दूबे समपर्क करें 9425171001)

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