विविधता से एकात्मता तक’ मोहन भागवत की विश्व यात्रा और संघ का वैश्विक संदेश

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की हालिया तीन देशों की यात्रा को केवल एक संगठन के प्रमुख की विदेश यात्रा के रूप में देखना इस पूरे घटनाक्रम को सीमित कर देना होगा।

विविधता से एकात्मता तक’ मोहन भागवत की विश्व यात्रा और संघ का वैश्विक संदेश
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आज की दुनिया, तकनीक के स्तर पर पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है, लेकिन सामाजिक और मानसिक स्तर पर उतनी ही तेजी से बंटती भी दिखाई दे रही है। भौगोलिक सीमाएं सिकुड़ी हैं, संचार की गति असाधारण हुई है और एक देश में घटने वाली घटना कुछ ही क्षणों में दूसरे महाद्वीप की बहस का हिस्सा बन जाती है। इसके बावजूद मनुष्य के बीच दूरी कम होने के बजाय अनेक स्तरों पर बढ़ती दिखाई देती है। धर्म, नस्ल, भाषा, क्षेत्र, विचारधारा, राजनीतिक पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्नों ने दुनिया के अनेक समाजों को भीतर तक प्रभावित किया है। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक डॉ. मोहन भागवत की हालिया तीन देशों की यात्रा को केवल एक संगठन के प्रमुख की विदेश यात्रा के रूप में देखना इस पूरे घटनाक्रम को सीमित कर देना होगा। यह यात्रा उस व्यापक विमर्श का हिस्सा बनकर सामने आई जिसमें भारत की सभ्यतागत दृष्टि, हिंदू चिंतन, विविधता में एकता, सेवा, सामाजिक समरसता और वैश्विक शांति जैसे विषयों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखा गया।

 

25 अगस्त से 7 सितंबर 2026 तक चले इस तीन देशों के दौरे में अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन शामिल रहे। न्यूयॉर्क में ‘यूनिवर्सल ऑननेस’, कनाडा में ‘हिंदू विश्व बंधु’ और लंदन में ‘सेलिब्रेट ऑननेस’ जैसे आयोजनों के माध्यम से जिस विचार को लगातार अलग-अलग शब्दों में सामने रखा गया, उसका केंद्रीय भाव था कि दुनिया को एकरूप बनाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि विविधताओं के बीच एकता का बोध विकसित हो। संघ की ओर से इसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय परंपरा से जोड़ा गया।

 

मोहन भागवत की इस यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह संघ के शताब्दी वर्ष के समय हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सौ वर्ष पूरे कर चुका है और अब अपने दूसरे शताब्दी काल की ओर बढ़ रहा है। भारत में संघ का प्रभाव, उसका सामाजिक विस्तार और उससे जुड़े वैचारिक प्रश्न लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा रहे हैं। लेकिन विदेशों में संघ के विचार को लेकर स्थिति अलग है। वहां भारतीय मूल के समुदायों के बीच संघ और हिंदुत्व को लेकर एक ओर आत्मीयता और सांस्कृतिक जुड़ाव दिखाई देता है, तो दूसरी ओर उसके राजनीतिक और सामाजिक अर्थों को लेकर बहस और आलोचना भी मौजूद है। इसलिए इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि संघ ने स्वयं को दुनिया के सामने किस भाषा में प्रस्तुत किया और किन मुद्दों को प्राथमिकता दी।

 

न्यूयॉर्क से शुरू हुई इस यात्रा में ‘यूनिवर्सल ऑननेस’ का विचार प्रमुख था। 29 अगस्त को आयोजित कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में हिंदू-अमेरिकी संगठनों और विभिन्न समुदायों से जुड़े लोगों ने भाग लिया। संघ से जुड़े आयोजकों ने इसे केवल हिंदू समाज का कार्यक्रम न बनाकर व्यापक मानवीय एकता और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश की। कार्यक्रमों में सामाजिक समरसता, नागरिक जिम्मेदारी, पर्यावरण, परिवार और समुदाय, सेवा तथा अंतरधार्मिक संवाद जैसे विषयों को भी जोड़ा गया। इस प्रकार ‘एकात्मता’ का अर्थ केवल धार्मिक या सांस्कृतिक एकरूपता नहीं बल्कि सामाजिक संबंधों की पुनर्स्थापना के रूप में प्रस्तुत किया गया।

 

मोहन भागवत के संदेश में बार-बार यह बात उभरी कि विविधता प्रकृति का स्वाभाविक गुण है। दुनिया में अलग-अलग भाषाएं हैं, अलग-अलग संस्कृतियां हैं, अलग-अलग पूजा-पद्धतियां हैं, अलग-अलग जीवनशैलियां हैं और अलग-अलग सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। यदि एकता का अर्थ इन सभी भिन्नताओं को मिटाना मान लिया जाए तो दुनिया कभी एक नहीं हो सकती। लेकिन यदि एकता का अर्थ इन भिन्नताओं के पीछे मौजूद मनुष्य की समानता को स्वीकार करना हो, तो एक व्यापक मानवीय एकात्मता संभव है। यही वह बिंदु है जहां संघ की भारतीय सभ्यतागत दृष्टि पश्चिमी ‘यूनिफॉर्मिटी’ यानी समानरूपता की अवधारणा से अलग दिखाई देने की कोशिश करती है।

 

लंदन में 6 सितंबर को आयोजित ‘सेलिब्रेट ऑननेस’ कार्यक्रम में इसी विचार को और स्पष्ट रूप मिला। वहां 326 संगठनों से जुड़े 600 से अधिक लोगों की भागीदारी का उल्लेख संघ की ओर से किया गया। भागवत ने कहा कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए उन बातों पर जोर देना चाहिए जो लोगों को जोड़ती हैं, न कि उन बातों पर जो उन्हें अलग करती हैं। उनके भाषण में ‘अपनापन’ एक महत्वपूर्ण शब्द बनकर सामने आया। संघ की व्याख्या में अपनापन किसी राजनीतिक नारे से अधिक एक सामाजिक मनोविज्ञान है - दूसरे व्यक्ति को अपना मानने की क्षमता। जब समाज में यह भाव कमजोर होता है तो कानून, संस्थाएं और व्यवस्थाएं होने के बावजूद अविश्वास बढ़ता जाता है। जब अपनापन मजबूत होता है तो सामाजिक संबंधों में सहयोग और जिम्मेदारी की भावना पैदा होती है।

 

यहां संघ की ‘सेवा’ की अवधारणा भी महत्वपूर्ण हो जाती है। संघ लंबे समय से सेवा कार्यों को अपनी सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख आधार बताता रहा है। भागवत ने विदेशों में भी यह बात रखी कि सेवा किसी पर उपकार करने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। यदि सेवा करने वाला व्यक्ति स्वयं को ऊपर और सेवा पाने वाले को नीचे मानने लगे तो सेवा का मूल भाव समाप्त हो जाता है। सेवा का वास्तविक अर्थ है बिना किसी अपेक्षा के समाज के लिए काम करना। इस विचार को यदि व्यापक संदर्भ में देखें तो यह आधुनिक कल्याणकारी समाज की उस चुनौती से भी जुड़ता है जिसमें सामाजिक सहायता और आत्मसम्मान के बीच संतुलन बनाना लगातार कठिन होता जा रहा है।

कनाडा में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु’ कार्यक्रम ने इस संदेश को एक अन्य आयाम दिया। वहां 2,000 से अधिक प्रतिनिधियों और 175 से अधिक संगठनों की भागीदारी का उल्लेख किया गया। कनाडा के सभी प्रांतों से लोगों के जुड़ने की बात सामने आई। यहां भी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और विविधता के सम्मान को केंद्रीय विचार बनाया गया। भारतीय सभ्यता की उस परंपरा का उल्लेख किया गया जिसमें अलग-अलग मतों, पंथों और आस्थाओं के लोगों को स्थान देने की बात कही जाती है।

 

यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रवासी भारतीयों की भूमिका पिछले कुछ दशकों में बदल गई है। पहले प्रवासी समुदायों को मुख्यतः अपने मूल देश से सांस्कृतिक रूप से जुड़े लोगों के समूह के रूप में देखा जाता था। आज वे जिस देश में रहते हैं वहां की अर्थव्यवस्था, राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और सामाजिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। भारतीय मूल के लोग अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में केवल भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि उन देशों के नागरिक भी हैं। इसलिए विदेशों में भारतीय पहचान की चर्चा करते हुए दोहरी जिम्मेदारी का प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना और वर्तमान देश के प्रति पूरी निष्ठा रखना।

 

लंदन में भागवत ने इसी संदर्भ में ‘जन्मभूमि’ और ‘कर्मभूमि’ के बीच संबंध की चर्चा की। उनका कहना था कि ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं की निष्ठा उनकी कर्मभूमि यानी ब्रिटेन के प्रति होनी चाहिए। भारत जन्मभूमि हो सकता है और वहां से मूल्य मिल सकते हैं, लेकिन जिन लोगों का जीवन, काम और सामाजिक जिम्मेदारी ब्रिटेन में है, उनकी सेवा और प्रतिबद्धता वहीं के समाज के प्रति होनी चाहिए। यह संदेश प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारतीय सांस्कृतिक पहचान और वर्तमान नागरिक दायित्व को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय साथ रखने की कोशिश दिखाई देती है।

 

यहीं से हिंदुत्व के अर्थ का प्रश्न भी सामने आता है। भारत के सार्वजनिक विमर्श में ‘हिंदुत्व’ शब्द अत्यंत राजनीतिक और वैचारिक अर्थों से जुड़ा हुआ है। संघ की अपनी व्याख्या में हिंदुत्व केवल पूजा-पद्धति या किसी एक धार्मिक पहचान का नाम नहीं है, बल्कि भारत की व्यापक सांस्कृतिक और सभ्यतागत दृष्टि है। भागवत ने विदेशों में भी यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि हिंदू होने को केवल धार्मिक अनुष्ठानों के आधार पर परिभाषित करना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार भारतीय परंपरा में अलग-अलग पूजा-पद्धतियों और जीवन दृष्टियों के लिए स्थान रहा है। यह संघ के उस व्यापक दावे से जुड़ता है जिसके अनुसार ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा का अर्थ किसी एक धार्मिक समुदाय की राजनीतिक प्रभुता स्थापित करना नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को समझना है। संघ के अनुसार भारत में विविधता स्वाभाविक है और एकता उसका मूल सत्य है। आलोचक इस व्याख्या को अलग नजरिए से देखते हैं और सवाल उठाते हैं कि व्यवहार में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा अल्पसंख्यकों और असहमति रखने वाले समूहों के अधिकारों तथा समान नागरिकता के प्रश्नों को कैसे प्रभावित करेगी। इसलिए इस विषय पर किसी भी गंभीर लेख में संघ की स्वयं की व्याख्या और उसके आलोचकों की चिंताओं दोनों को साथ रखना आवश्यक है। यही लोकतांत्रिक विमर्श की शर्त भी है।

 

मोहन भागवत की विदेश यात्रा के आसपास अमेरिका और ब्रिटेन में विरोध के स्वर भी सामने आए। कुछ संगठनों और राजनीतिक समूहों ने संघ की विचारधारा को लेकर आपत्तियां व्यक्त कीं और इसे लेकर विरोध किया। अमेरिका में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी की ओर से भी कार्यक्रम को लेकर असहमति सामने आई। अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े कुछ संस्थानों ने संघ पर गंभीर आरोप लगाए, जबकि संघ और भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया। इस पूरे विवाद से यह स्पष्ट होता है कि संघ की वैश्विक छवि एक समान नहीं है। एक ओर बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग संघ के सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश से जुड़ते हैं, दूसरी ओर मानवाधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार और राजनीतिक राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से उसके विचारों की आलोचना भी होती है। ऐसे विरोध के बीच भागवत द्वारा ‘अपनापन’, ‘सेवा’ और ‘एकात्मता’ को प्रमुखता देना एक रणनीतिक संचार के रूप में भी देखा जा सकता है। संघ स्वयं को केवल राजनीतिक विचारधारा के रूप में नहीं बल्कि समाज-निर्माण के संगठन के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। संघ की भाषा में राष्ट्र केवल राज्य या सरकार का नाम नहीं है। राष्ट्र एक सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना भी है। इस दृष्टि से विदेशों में बसे भारतीय मूल के समुदायों से संवाद का उद्देश्य केवल भारतीय संस्कृति का प्रचार नहीं बल्कि उन्हें स्थानीय समाजों के साथ सक्रिय रूप से जोड़ना भी है।

 

न्यूयॉर्क में ‘यूनिवर्सल ऑननेस’ और लंदन में ‘सेलिब्रेट ऑननेस’ के बीच भी एक वैचारिक निरंतरता दिखाई देती है। एक ओर भारतीय परंपरा का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ है, दूसरी ओर पश्चिमी समाजों की बहुलतावादी लोकतांत्रिक संरचना। संघ की कोशिश यह बताने की रही कि भारतीय सभ्यतागत दृष्टि और आधुनिक बहुलतावाद के बीच संवाद संभव है। सवाल यह है कि क्या इस संवाद को केवल सांस्कृतिक मंचों तक सीमित रखा जा सकता है या इसे सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में भी उतारा जा सकता है।

 

यहीं आज की दुनिया की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक सामने आती है वह है पहचान की राजनीति। लगभग हर समाज में लोग अपनी पहचान को लेकर अधिक सजग हुए हैं। जातीय पहचान, धार्मिक पहचान, राष्ट्रीय पहचान, लैंगिक पहचान, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक पहचान ने सार्वजनिक जीवन को प्रभावित किया है। पहचान अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब पहचान सम्मान का आधार बनने के बजाय दूसरों को अस्वीकार करने का आधार बन जाती है। ‘मैं कौन हूं’ का प्रश्न यदि ‘तुम कौन हो और इसलिए तुम मेरे विरोधी हो’ में बदल जाए तो सामाजिक तनाव बढ़ता है।


भागवत के संदेश में विविधता और एकता को साथ रखने का आग्रह इसी समस्या का उत्तर प्रस्तुत करने का प्रयास है। उनका तर्क यह है कि समाज को एक बनाने के लिए सबको समान बनाना जरूरी नहीं है। यदि अलग-अलग समुदाय अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए एक व्यापक सामाजिक उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध हो सकें, तो विविधता संघर्ष का कारण नहीं बल्कि शक्ति बन सकती है। यह विचार भारत जैसे देश के लिए विशेष महत्व रखता है, जहां भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता अत्यंत व्यापक है।


लेकिन यह विचार केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में नस्लीय और सांस्कृतिक विविधता, कनाडा में बहुसांस्कृतिक समाज, ब्रिटेन में प्रवासी समुदायों की भूमिका और यूरोप में बढ़ती प्रवासन बहस - इन सभी के बीच यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि बहुल समाज किस प्रकार अपनी एकता बनाए रख सकते हैं। क्या एकता के लिए साझा संस्कृति जरूरी है? क्या नागरिकता पर्याप्त है? क्या सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय निष्ठा साथ-साथ चल सकती हैं? संघ की ओर से दिया गया उत्तर है कि चल सकती हैं, बशर्ते समाज में ‘अपनापन’ और साझा जिम्मेदारी की भावना हो।

 

इस संदर्भ में युवा पीढ़ी का प्रश्न भी यात्रा के संदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। आज की युवा पीढ़ी विशेष रूप से वैश्विक है। उसका जीवन इंटरनेट, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वैश्विक शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय रोजगार और डिजिटल संस्कृति से प्रभावित है। वह पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक तेजी से अलग-अलग विचारों से परिचित होती है। उसके सामने अवसर भी अधिक हैं और भ्रम भी। भागवत ने युवाओं के संदर्भ में जिस बात पर जोर दिया, उसमें भरोसा और अनुभव साझा करने का भाव था। नई पीढ़ी पर पुराने ढांचे थोपने के बजाय उसे ज्ञान और अनुभव देकर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है।

 

यह विचार संघ के सामने स्वयं उपस्थित चुनौती से भी जुड़ा है। सौ वर्ष तक किसी संगठन को जीवित रखना और उसके बाद उसे अगले सौ वर्षों तक प्रासंगिक बनाए रखना दो अलग-अलग कार्य हैं। बीसवीं सदी की सामाजिक परिस्थितियों में विकसित संगठन को इक्कीसवीं सदी की डिजिटल, वैश्विक और अत्यंत तेज गति वाली दुनिया में अपनी भाषा और कार्य-पद्धति को निरंतर विकसित करना होगा। संघ के सामने प्रश्न केवल विस्तार का नहीं बल्कि प्रासंगिकता का भी है।

 

आज युवा केवल भाषण सुनकर किसी विचार से नहीं जुड़ता। वह सवाल पूछता है, प्रमाण मांगता है, वैकल्पिक विचार पढ़ता है और सोशल मीडिया पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है। इसलिए किसी भी संगठन के लिए विचार और व्यवहार के बीच दूरी कम करना आवश्यक हो गया है। संघ यदि ‘एकात्मता’ की बात करता है तो उसे सामाजिक स्तर पर भेदभाव, असमानता और अविश्वास के प्रश्नों से भी लगातार जूझना होगा। यदि वह ‘सेवा’ को मूल मूल्य बताता है तो सेवा के कामों का प्रभाव, पारदर्शिता और समाज में वास्तविक परिवर्तन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

 

पर्यावरण का मुद्दा भी इस यात्रा के संदेश में उल्लेखनीय रहा। संघ ने अपनी व्यापक सामाजिक दृष्टि में ‘पंच परिवर्तन’ जैसे विषयों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक का कम उपयोग और हरियाली बढ़ाने पर जोर दिया है।  यह विषय अब केवल पर्यावरणवादियों का मुद्दा नहीं रह गया है। पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, जंगलों का विनाश, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव सीधे मानव जीवन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

 

भारतीय दृष्टि से प्रकृति को केवल संसाधन मानने के बजाय जीवन के साथ जुड़ी सत्ता के रूप में देखने की परंपरा का उल्लेख संघ अक्सर करता है। लेकिन इस विचार की वास्तविक परीक्षा व्यवहार में होती है। जल संरक्षण तभी प्रभावी होगा जब व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में पानी की बर्बादी कम करे। प्लास्टिक की समस्या तभी कम होगी जब उपभोग की आदत बदले। पर्यावरण तभी बचेगा जब विकास और प्रकृति के बीच संतुलन की नीति बने। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को केवल सांस्कृतिक या आध्यात्मिक विचार के रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक सामाजिक अनुशासन के रूप में देखना आवश्यक है।

 

गो-संरक्षण का विषय भी भागवत के लंदन प्रवास के दौरान चर्चा में आया। भारतीय समाज में गाय का प्रश्न धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक - चारों स्तरों पर मौजूद है। संघ की दृष्टि में गो-संरक्षण भारतीय जीवन परंपरा से जुड़ा प्रश्न है। लेकिन इस विषय के साथ भारत में राजनीतिक विवाद भी जुड़े हैं। इसलिए गो-संरक्षण की चर्चा करते समय धार्मिक आस्था के साथ पशु कल्याण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और कानून-व्यवस्था जैसे पहलुओं को भी साथ देखना होगा। किसी भी सांस्कृतिक विचार की व्यापक स्वीकार्यता तभी संभव होती है जब वह सामाजिक संवेदनशीलता और कानून के शासन के साथ संतुलित हो।

 

भागवत की लंदन यात्रा में धार्मिक और सांस्कृतिक संवाद का एक और दृश्य महत्वपूर्ण रहा, जब उन्होंने सिख समुदाय से जुड़े स्थल का दौरा किया। यह प्रतीकात्मक रूप से उस व्यापक संवाद की ओर संकेत करता है जिसमें भारतीय मूल की अलग-अलग परंपराओं के बीच संबंध को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। विदेशों में बसे भारतीय मूल के समुदायों की एक बड़ी विशेषता यही है कि वहां भारतीय पहचान अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक धाराओं से मिलकर बनी है। इसलिए विदेशों में भारतीय समाज की एकता केवल हिंदू पहचान तक सीमित नहीं हो सकती। सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, ईसाई और अन्य भारतीय मूल के समुदाय भी उस व्यापक प्रवासी भारतीय अनुभव का हिस्सा हैं।

 

यहां ‘हिंदू विश्व बंधु’ जैसे शब्द को भी उसके व्यापक संदर्भ में समझना होगा। संघ के लिए हिंदू शब्द कई बार सांस्कृतिक और सभ्यतागत अर्थ में प्रयुक्त होता है, लेकिन वैश्विक मंच पर इस शब्द का अर्थ हर व्यक्ति समान रूप से नहीं लेता। यही कारण है कि संघ के लिए चुनौती केवल अपना संदेश देने की नहीं बल्कि उस संदेश को ऐसे संवाद में बदलने की भी है जिसमें दूसरे समुदाय स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।

 

दुनिया में धार्मिक तनाव बढ़ने के दौर में अंतरधार्मिक संवाद का महत्व इसी कारण बढ़ा है। संवाद का अर्थ यह नहीं कि सभी मतों को समान मान लिया जाए या मतभेद समाप्त कर दिए जाएं। संवाद का अर्थ है कि मतभेद के बावजूद दूसरे के अस्तित्व और अधिकार का सम्मान किया जाए। यदि धर्म को केवल पहचान की दीवार बनाने के बजाय नैतिक जिम्मेदारी का स्रोत बनाया जाए तो धार्मिक विविधता सामाजिक शक्ति बन सकती है।

 

मोहन भागवत की यात्रा के दौरान बार-बार आया ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। ‘दुनिया एक परिवार है’ कहना आसान है, लेकिन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसे लागू करना अत्यंत कठिन है। राष्ट्र अपने हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सुरक्षा, संसाधन, व्यापार, तकनीक और भू-राजनीति के कारण देशों के बीच संघर्ष बना रहता है। ऐसे में विश्व-परिवार की अवधारणा एक नैतिक आदर्श तो हो सकती है, लेकिन उसकी व्यावहारिकता तभी सिद्ध होगी जब शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर देशों के हितों को भी महत्व दें और विकास का मॉडल केवल संसाधनों के अधिकतम दोहन पर आधारित न हो।

 

आज दुनिया में युद्ध और संघर्ष की स्थिति, शरणार्थियों की समस्या, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट और तकनीकी असंतुलन मानवता के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले वर्षों में रोजगार, शिक्षा, सूचना और सत्ता के स्वरूप को बदल सकती है। सोशल मीडिया समाज को जोड़ने के साथ-साथ लोगों को वैचारिक खेमों में भी बांट सकता है। सूचना की अधिकता ने ज्ञान की समस्या हल नहीं की है; बल्कि गलत सूचना और दुष्प्रचार को नई शक्ति दे दी है।

 

ऐसे समय में ‘सत्य’, ‘जिम्मेदारी’ और ‘संयम’ जैसे मूल्य किसी भी सभ्यता के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। संघ की सामाजिक दृष्टि में व्यक्तिगत चरित्र को इसलिए महत्व दिया जाता है क्योंकि उसके अनुसार राष्ट्र का निर्माण केवल संस्थाओं से नहीं बल्कि नागरिकों के चरित्र से होता है। यदि नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों, सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करें, कानून का पालन करें, स्वच्छता रखें और दूसरों के अधिकारों को स्वीकार करें तो समाज मजबूत होता है।

 

नागरिक अनुशासन का यह विषय भी भागवत के संदेशों में दिखाई देता है। सड़क पर नियमों का पालन, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता, पानी की बचत, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और दूसरे व्यक्ति के प्रति सम्मान जैसी बातें देखने में छोटी लग सकती हैं, लेकिन किसी राष्ट्र की सामाजिक संस्कृति इन्हीं छोटे व्यवहारों से बनती है। बड़े राष्ट्रीय आदर्श तभी जीवित रहते हैं जब वे रोजमर्रा के जीवन में दिखाई दें।

 

संघ की दृष्टि में राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का काम नहीं है। सरकार नीतियां बना सकती है, कानून बना सकती है और संसाधन उपलब्ध करा सकती है, लेकिन समाज का चरित्र नागरिकों के व्यवहार से बनता है। यह विचार आधुनिक लोकतंत्र के उस सिद्धांत से भी जुड़ता है जिसमें नागरिक केवल अधिकारों के उपभोक्ता नहीं बल्कि जिम्मेदारियों के वाहक भी होते हैं।

 

मोहन भागवत की विदेश यात्रा का एक बड़ा संदेश इसलिए प्रवासी भारतीयों के लिए भी था। विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोग भारत के सांस्कृतिक प्रतिनिधि तो हैं ही, लेकिन उससे पहले वे अपने-अपने देशों के नागरिक हैं। उनकी सफलता भारतीय समुदाय की प्रतिष्ठा बढ़ाती है, लेकिन उनकी सामाजिक जिम्मेदारी उस समाज के प्रति भी है जिसमें वे रहते हैं। यदि भारतीय मूल का समुदाय स्थानीय समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, विज्ञान, सामाजिक सेवा और नागरिक जीवन में योगदान देता है तो उसकी सांस्कृतिक पहचान और अधिक सम्मान प्राप्त करती है।

 

यहां से संघ के वैश्विक विस्तार का प्रश्न भी सामने आता है। विदेशों में संघ से जुड़े संगठन और स्वयंसेवक लंबे समय से सक्रिय हैं। उनका स्वरूप भारत के संगठनात्मक ढांचे से अलग हो सकता है, लेकिन सांस्कृतिक जुड़ाव एक महत्वपूर्ण आधार है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में भारतीय मूल की नई पीढ़ी जन्मी और पली-बढ़ी है। उनके लिए भारत एक भावनात्मक और सांस्कृतिक संदर्भ हो सकता है, लेकिन उनका जीवन स्थानीय समाज में है। इसलिए भविष्य का भारतीय प्रवासी समुदाय ‘दो दुनिया के बीच’ रहने वाला समुदाय नहीं बल्कि दोनों समाजों को जोड़ने वाला सेतु बन सकता है।

 

संघ की दृष्टि में यही ‘विश्व बंधु’ की भावना का विस्तार हो सकता है। भारत से दुनिया को केवल भारतीय संस्कृति का निर्यात नहीं करना है, बल्कि दुनिया के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना है। भारत भी दुनिया से सीखता है और दुनिया भारत से सीख सकती है। लोकतंत्र, विज्ञान, तकनीक, मानवाधिकार, आधुनिक संस्थाएं और आर्थिक प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भारत ने दुनिया से बहुत कुछ ग्रहण किया है। इसी तरह योग, ध्यान, भारतीय दर्शन, आयुर्वेद, परिवार की अवधारणा, सामुदायिक जीवन और प्रकृति के साथ संतुलन जैसे क्षेत्रों में भारत की परंपराएं वैश्विक संवाद का हिस्सा बन सकती हैं।

 

लेकिन इस पूरे विमर्श की सबसे बड़ी कसौटी यह होगी कि ‘भारतीय दृष्टि’ को सार्वभौमिक बताते समय भारत के भीतर मौजूद समस्याओं को भी ईमानदारी से स्वीकार किया जाए। विविधता में एकता का आदर्श तभी विश्वसनीय होगा जब भारत में विविध समुदायों के बीच विश्वास मजबूत हो। सामाजिक समरसता की बात तभी प्रभावी होगी जब जातीय भेदभाव और सामाजिक असमानता कम हों। सेवा की बात तभी प्रभावी होगी जब समाज के कमजोर वर्गों तक सहायता पहुंचे। महिला सम्मान की बात तभी सार्थक होगी जब महिलाओं की सुरक्षा और अवसरों में वास्तविक सुधार हो। पर्यावरण की बात तभी प्रभावी होगी जब विकास परियोजनाओं में प्रकृति और स्थानीय समुदायों का संतुलन रखा जाए।

 

यही वह स्थान है जहां संघ के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। उसका सामाजिक नेटवर्क व्यापक है और उसके पास स्वयंसेवकों की बड़ी संख्या है। यदि यह नेटवर्क शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में लगातार काम करता है तो संघ की सामाजिक भूमिका और मजबूत हो सकती है। लेकिन जितना बड़ा प्रभाव होगा, उतनी ही बड़ी सार्वजनिक जवाबदेही की अपेक्षा भी होगी।

 

संघ की आलोचनाओं को केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज करना भी पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में किसी भी प्रभावशाली संगठन से सवाल पूछे जाना स्वाभाविक है। अल्पसंख्यकों की चिंता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक समानता और राजनीतिक प्रभाव जैसे प्रश्नों पर संघ को अपने विचार और व्यवहार दोनों के माध्यम से जवाब देना होगा। दूसरी ओर संघ से जुड़े लोगों के लिए भी यह आवश्यक होगा कि वे आलोचना और विरोध के बीच अंतर समझें। किसी विचार से असहमति लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा है; असहमति को शत्रुता मान लेना संवाद की संभावना को समाप्त कर देता है।

 

भागवत के ‘अपनापन’ के विचार की वास्तविक परीक्षा शायद यहीं है। क्या अपनापन केवल समान विचार रखने वालों के बीच रहेगा या असहमत व्यक्ति के लिए भी जगह बनाएगा? क्या ‘एकात्मता’ का अर्थ केवल सांस्कृतिक समानता होगा या विचारों की विविधता को भी स्वीकार करेगा? क्या ‘हिंदू’ की व्यापक सभ्यतागत परिभाषा में वे लोग भी स्वयं को सहज महसूस करेंगे जो धार्मिक रूप से हिंदू नहीं हैं? इन प्रश्नों का उत्तर केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से मिलेगा।

 

यही बात ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा पर भी लागू होती है। यदि संघ इसे सांस्कृतिक एकात्मता का नाम देता है तो उस एकात्मता का सबसे बड़ा प्रमाण यही होगा कि भारत का प्रत्येक नागरिक अपने धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्र की पहचान के साथ स्वयं को समान रूप से भारतीय महसूस करे। यदि किसी विचार को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वीकृति प्राप्त करनी है तो उसे अपने समर्थकों से अधिक उदार और अपने विरोधियों के प्रति अधिक संवादशील होने की क्षमता दिखानी होगी।

 

इस दृष्टि से भागवत की विदेश यात्रा को संघ की विचारधारा के अंतरराष्ट्रीय संचार की एक महत्वपूर्ण कोशिश माना जा सकता है। न्यूयॉर्क में वैश्विक एकात्मता, टोरंटो में विश्व बंधुत्व और लंदन में विविधता के बीच एकता - तीनों आयोजनों के नाम अलग थे, लेकिन संदेश में एक समानता थी। वह समानता थी कि मानव समाज की विविधताओं को मिटाकर नहीं बल्कि उन्हें स्वीकार करते हुए एक साझा मानवीय आधार खोजा जाए।

 

इस संदेश का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संघ अपने शताब्दी वर्ष के बाद स्वयं को केवल भारत की सीमाओं तक सीमित संगठन के रूप में नहीं देखना चाहता। उसके विचार और संगठन से जुड़े समुदाय अब दुनिया के अनेक देशों में मौजूद हैं। इसलिए उसका अगला चरण केवल संगठन विस्तार नहीं बल्कि वैश्विक संवाद का भी हो सकता है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका ने इस संभावना को और बढ़ाया है।

 

भारत आज विश्व अर्थव्यवस्था, तकनीक, कूटनीति और भू-राजनीति में पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली है। भारतीय मूल के लोग दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण संस्थानों में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे समय में भारत की सभ्यतागत छवि भी अंतरराष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन रही है। योग और आयुर्वेद से लेकर भारतीय दर्शन और लोकतंत्र तक भारत के बारे में वैश्विक जिज्ञासा बढ़ी है। इसी वातावरण में संघ भी अपनी वैचारिक भूमिका को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है।

 

लेकिन भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा केवल आर्थिक शक्ति या सांस्कृतिक विरासत से नहीं बनेगी। वह इस बात से भी बनेगी कि भारत अपने भीतर कितनी सामाजिक शांति और नागरिक समानता कायम कर पाता है। दुनिया भारत को देख रही है और भारतीय समाज भी दुनिया से संवाद कर रहा है। इसलिए ‘विश्व गुरु’ जैसे विचारों की सार्थकता तभी होगी जब भारत स्वयं अपने आदर्शों को व्यवहार में उतार सके।

 

मोहन भागवत की यात्रा का शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश इसी अंतर्विरोध में छिपा है। दुनिया को एकता का संदेश देना आसान है; विविधताओं के बीच वास्तव में एक समाज बनाना कठिन है। सेवा की बात करना आसान है लेकिन बिना अपेक्षा के सेवा करना कठिन है। पर्यावरण की चिंता व्यक्त करना आसान है लेकिन अपनी जीवनशैली बदलना कठिन है। सांस्कृतिक गौरव की बात करना आसान है लेकिन दूसरे की संस्कृति का सम्मान करना कठिन है। राष्ट्र की बात करना आसान है परंतु राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को बराबरी का अनुभव कराना कठिन है।

 

यदि संघ अपनी दूसरी शताब्दी में इन कठिन सवालों से भी उतनी ही गंभीरता से संवाद करता है जितनी गंभीरता से वह सांस्कृतिक एकता के प्रश्न पर करता है, तो उसकी सामाजिक भूमिका और व्यापक हो सकती है। यदि वह केवल अपने समर्थकों को संबोधित करने के बजाय अपने आलोचकों, अन्य धार्मिक समुदायों, युवाओं, महिलाओं, वैश्विक भारतीय समुदाय और असहमत नागरिकों से भी संवाद का विस्तार करता है, तो ‘एकात्मता’ का उसका संदेश अधिक विश्वसनीय बन सकता है।

 

और यही आज की दुनिया की भी सबसे बड़ी जरूरत है। दुनिया को ऐसी एकता की आवश्यकता नहीं है जिसमें सभी एक जैसे हो जाएं। उसे ऐसी एकता चाहिए जिसमें अलग-अलग लोग अपनी पहचान के साथ सुरक्षित रह सकें और फिर भी एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदार महसूस करें। लोकतंत्र की सफलता भी इसी में है, बहुलतावाद की सफलता भी और मानव सभ्यता की निरंतरता भी।

 

मोहन भागवत की तीन देशों की यात्रा इसी व्यापक प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखती दिखाई दी कि क्या मानवता अपनी विविधताओं को संघर्ष का कारण बनाए बिना साझा भविष्य की ओर बढ़ सकती है? संघ का उत्तर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘अपनापन’, ‘सेवा’ और ‘एकात्मता’ जैसे शब्दों में सामने आया। आलोचकों की ओर से इसके राजनीतिक और सामाजिक अर्थों पर सवाल भी उठे। इन दोनों पक्षों के बीच वास्तविक मूल्यांकन का रास्ता भावनात्मक समर्थन या अस्वीकार में नहीं बल्कि विचार और व्यवहार की तुलना में है।

 

आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संघ की दूसरी शताब्दी की यात्रा किस दिशा में जाती है। क्या वह अपने पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे को नई पीढ़ी की आकांक्षाओं से जोड़ पाएगा? क्या उसकी वैश्विक शाखाएं स्थानीय समाजों में संवाद और सेवा का माध्यम बनेंगी? क्या ‘हिंदू’ की सभ्यतागत अवधारणा को वह इस तरह प्रस्तुत कर पाएगा कि विविध धार्मिक समुदाय उसमें अपने लिए सम्मानजनक स्थान महसूस करें? क्या ‘हिंदू राष्ट्र’ की उसकी व्याख्या समान नागरिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ व्यापक सामाजिक सहमति बना पाएगी? क्या पर्यावरण, परिवार, सामाजिक समरसता और सेवा जैसे विषय राजनीतिक ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर वास्तविक सामाजिक अभियानों का रूप ले सकेंगे?

 

इन सवालों के उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि मोहन भागवत की यह यात्रा केवल तीन देशों की यात्रा नहीं थी। यह उस वैचारिक यात्रा का भी एक पड़ाव थी जिसमें संघ भारत की सभ्यतागत दृष्टि को वैश्विक संदर्भ में समझाने की कोशिश कर रहा है। न्यूयॉर्क से टोरंटो और टोरंटो से लंदन तक संदेश के शब्द बदलते रहे, लेकिन केंद्रीय विचार लगभग वही रहा कि दुनिया की विविधता को स्वीकार करो, मनुष्य के भीतर अपनापन जगाओ, सेवा को उपकार नहीं बल्कि कर्तव्य मानो, प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनो, अपनी जड़ों से जुड़े रहो लेकिन जहां रहते हो वहां के समाज के प्रति पूरी निष्ठा निभाओ और ऐसी एकता की तलाश करो जो समानता थोपे नहीं बल्कि भिन्नताओं को साथ लेकर चले।

 

शायद यही इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा अर्थ है। आज की दुनिया को किसी एक संस्कृति की विजय से अधिक ऐसी सभ्यता की आवश्यकता है जिसमें अनेक संस्कृतियां साथ रह सकें। उसे ऐसी राजनीति से अधिक ऐसी सामाजिक चेतना की जरूरत है जो विरोधी को शत्रु न बनाए। उसे ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जो विकास के साथ प्रकृति को भी बचाए। उसे ऐसी तकनीक चाहिए जो मनुष्य को जोड़ने का माध्यम बने, बांटने का हथियार नहीं। और उसे ऐसे नागरिक चाहिए जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। यदि ‘विविधता में एकता’ केवल एक नारा न रहकर जीवन-पद्धति बन सके, यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल श्लोक न रहकर वैश्विक व्यवहार का आधार बन सके और यदि ‘अपनापन’ केवल अपने समुदाय तक सीमित न रहकर असहमति रखने वाले व्यक्ति तक भी पहुंच सके, तभी इस संदेश की वास्तविक शक्ति सामने आएगी। मोहन भागवत की विदेश यात्रा ने इसी संभावना को वैश्विक मंच पर रखा है। अब इसकी अगली परीक्षा भारत में भी होगी और दुनिया में भी क्योंकि एकात्मता का दावा भाषण से नहीं, उस समाज के व्यवहार से सिद्ध होता है जो उसे जीने का प्रयास करता है। यही संघ की दूसरी शताब्दी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है और शायद सबसे बड़ा अवसर भी।