मोदी-योगी पर विपक्ष का आक्रमण
2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए विपक्ष की रणनीति

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अब धीरे-धीरे राजनीतिक संघर्ष के निर्णायक चरण में प्रवेश कर रहा है। लगभग पांच महीने बाद होने वाले इस चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भारतीय जनता पार्टी के सामने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व और सरकार के विकास तथा कानून-व्यवस्था का रिकॉर्ड है, तो विपक्ष के सामने समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक ताकत, कांग्रेस की राष्ट्रीय उपस्थिति और 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले उत्साह को विधानसभा चुनाव में बदलने की चुनौती है।
2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल दिया था। भाजपा को राज्य की 80 लोकसभा सीटों में 33 सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। विपक्षी सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 2024 में भाजपा के सामने प्रभावी चुनौती पेश की थी। अब विपक्ष का लक्ष्य उस प्रदर्शन को 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहराना है।
मोदी-योगी पर सीधा राजनीतिक हमला
विपक्ष की रणनीति का पहला हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनाना है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार भाजपा सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और कथित सांप्रदायिक राजनीति को लेकर हमला कर रहे हैं। 10 सितंबर 2026 को लखनऊ में अखिलेश यादव ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह आर्थिक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए सांप्रदायिक राजनीति का सहारा लेती है। उन्होंने महंगाई तथा सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को भी उठाया और आरक्षण के सवाल पर भाजपा को घेरा।
अखिलेश का राजनीतिक संदेश साफ है—चुनाव को केवल कानून-व्यवस्था या धार्मिक मुद्दों पर न होने देकर रोजगार, महंगाई, आरक्षण, किसान, युवा और सामाजिक न्याय को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया जाए।
अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ दांव
समाजवादी पार्टी की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसका "पीडीए—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक" सामाजिक गठजोड़ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी सामाजिक समीकरण ने सपा को प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनने में मदद की थी। अब अखिलेश यादव इस समीकरण को और व्यापक बनाना चाहते हैं।
सपा की कोशिश केवल यादव और मुस्लिम मतदाताओं तक सीमित रहने की नहीं है। पार्टी गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलितों तथा युवाओं को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान, जाट और मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी भी इसी रणनीति का हिस्सा है। सपा सितंबर के अंत से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रैलियों की नई श्रृंखला शुरू करने की तैयारी कर रही है।
अखिलेश यादव का संदेश यह है कि भाजपा के व्यापक हिंदुत्व सामाजिक गठबंधन के मुकाबले विपक्ष को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का व्यापक गठबंधन खड़ा करना होगा।
राहुल गांधी और जातीय जनगणना का मुद्दा
कांग्रेस की रणनीति का केंद्रीय मुद्दा जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय है। राहुल गांधी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि देश की विभिन्न सामाजिक श्रेणियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और सामाजिक रूप से विविध राज्य में कांग्रेस इस मुद्दे के जरिए पिछड़े वर्गों तथा युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक जगह बढ़ाना चाहती है। ताजा राजनीतिक विश्लेषणों के अनुसार राहुल गांधी जातीय जनगणना और आरक्षण से जुड़े मुद्दों को भाजपा के पारंपरिक सामाजिक आधार में सेंध लगाने की रणनीति के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।
राहुल गांधी की चुनौती यह है कि कांग्रेस के पास सपा की तरह प्रदेशव्यापी मजबूत चुनावी मशीनरी नहीं है। इसलिए कांग्रेस और सपा के बीच सीटों का समझौता तथा जमीनी संगठन का तालमेल विपक्ष की सफलता के लिए निर्णायक होगा।
कांग्रेस की ‘बराबरी’ की मांग
कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में केवल सपा की सहयोगी भूमिका में दिखाई देना नहीं चाहती। पार्टी प्रदेश में अपने संगठन और राजनीतिक प्रभाव को फिर से मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा है कि गठबंधन “बराबरी और आपसी सम्मान” के आधार पर होना चाहिए। यह बयान बताता है कि सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस इस बार अधिक राजनीतिक हिस्सेदारी चाहती है।
यही विपक्ष की सबसे बड़ी परीक्षा भी है। यदि सपा और कांग्रेस सीटों के बंटवारे पर समय रहते सहमत हो जाते हैं, तो 2024 का सामाजिक और राजनीतिक तालमेल विधानसभा स्तर पर भी दोहराने की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन यदि दोनों दल अलग-अलग उम्मीदवार उतारते हैं, तो विपक्षी वोटों के विभाजन का खतरा रहेगा।
प्रियंका गांधी की भूमिका
कांग्रेस के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा भी महत्वपूर्ण प्रचार चेहरा हो सकती हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक नेतृत्व मुख्यतः स्थानीय कांग्रेस नेताओं और राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति के इर्द-गिर्द दिखाई दे रहा है, लेकिन प्रियंका का महिला मतदाताओं और भावनात्मक मुद्दों पर संवाद कांग्रेस के अभियान को अतिरिक्त ऊर्जा दे सकता है।
कांग्रेस का प्रयास होगा कि महिलाओं, युवाओं, रोजगार की तलाश कर रहे शिक्षित वर्ग और ग्रामीण मतदाताओं के बीच भाजपा सरकार के खिलाफ असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदला जाए।
विपक्ष के सामने सबसे बड़ा प्रश्न—सीट बंटवारा
उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता का सबसे कठिन अध्याय सीटों का बंटवारा है। 2024 में सपा और कांग्रेस का गठबंधन लोकसभा चुनाव में सफल रहा था, लेकिन विधानसभा चुनाव में 403 सीटों पर उम्मीदवारों का तालमेल कहीं अधिक जटिल होगा।
सपा का तर्क होगा कि वह प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और उसे अधिक सीटें मिलनी चाहिए। कांग्रेस दूसरी ओर अपने राष्ट्रीय प्रभाव तथा 2024 के लोकसभा प्रदर्शन के आधार पर पर्याप्त हिस्सेदारी मांग सकती है।
कांग्रेस और सपा के बीच औपचारिक सीट समझौता अभी अंतिम रूप में नहीं आया है। इसलिए विपक्ष की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण यही है कि दोनों दल व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर एक संयुक्त चुनावी ढांचा बना पाते हैं या नहीं।
बसपा की अलग राह
बहुजन समाज पार्टी की भूमिका चुनाव को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बनाने की क्षमता रखती है। मायावती फिलहाल सपा-कांग्रेस के साथ जाने के संकेत नहीं दे रही हैं। हाल के बयान में उन्होंने कांग्रेस और सपा पर निशाना साधते हुए अपनी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक राह पर जोर दिया।
विपक्ष के लिए यही बड़ी चुनौती है। यदि दलित मतदाताओं का एक हिस्सा बसपा के साथ रहता है, तो सपा के पीडीए समीकरण की चुनावी क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए अखिलेश यादव के सामने केवल भाजपा को चुनौती देने का सवाल नहीं है; उन्हें दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता भी बढ़ानी होगी।
ओवैसी की चुनौती
असदुद्दीन ओवैसी ने भी उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन के साथ बातचीत की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा है कि चुनाव के बाद पछताने के बजाय पहले बातचीत होनी चाहिए और उनकी पार्टी भाजपा की वापसी नहीं चाहती। लेकिन सपा ने फिलहाल इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है।
ओवैसी की सक्रियता मुस्लिम बहुल इलाकों में विपक्षी रणनीति के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है। सपा के सामने मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में एकजुट रखने की चुनौती रहेगी।
विपक्ष किन मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाहता है?
विपक्ष की संभावित चुनावी रणनीति को छह प्रमुख मुद्दों में समझा जा सकता है—
पहला—रोजगार और बेरोजगारी।
युवाओं को सरकारी भर्ती, भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और निजी क्षेत्र में अवसरों के सवाल पर भाजपा सरकार के खिलाफ लामबंद करने का प्रयास होगा।
दूसरा—जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय।
राहुल गांधी का यह मुद्दा कांग्रेस की रणनीति में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है, जबकि अखिलेश यादव इसे पीडीए राजनीति से जोड़ रहे हैं।
तीसरा—महंगाई।
अखिलेश यादव लगातार महंगाई को राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। विपक्ष कोशिश करेगा कि घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे चुनावी चर्चा में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भारी पड़ें।
चौथा—किसान।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान राजनीति विशेष महत्व रखती है। जाट, किसान और मुस्लिम मतदाताओं के बीच विपक्ष अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगा।
पांचवां—महिला मतदाता।
महिला सुरक्षा, रोजगार, महंगाई और सरकारी योजनाओं को लेकर विपक्ष भाजपा के महिला मतदाता आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर सकता है।
छठा—संविधान और आरक्षण।
कांग्रेस और सपा दोनों सामाजिक न्याय तथा आरक्षण के मुद्दे को भाजपा के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संदेश में बदलने का प्रयास कर सकते हैं।

योगी सरकार की जवाबी रणनीति
विपक्ष के हमले के सामने योगी आदित्यनाथ ने भी चुनावी तैयारी तेज कर दी है। मई 2026 से मुख्यमंत्री 44 से अधिक जिलों का दौरा कर चुके हैं और 115 विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ी 38,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का उद्घाटन या शिलान्यास कर चुके हैं। इनमें सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, पर्यटन और कौशल विकास जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।
विशेष बात यह है कि इन 115 विधानसभा क्षेत्रों में 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन 67 क्षेत्रों में आगे था। इसलिए योगी का यह दौरा केवल सरकारी विकास कार्यक्रम नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा रोजगार, कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा, विकास और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना रही है। स्वास्थ्य क्षेत्र में नकद रहित इलाज का विस्तार भी सरकार के चुनावी जनकल्याण अभियान का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
प्रमुख नेताओं के संदेश
अखिलेश यादव: भाजपा पर महंगाई और सांप्रदायिक राजनीति को लेकर हमला; पीडीए, सामाजिक न्याय और विपक्षी एकता को प्रमुख आधार बनाने की कोशिश।
राहुल गांधी: जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व को राष्ट्रीय तथा उत्तर प्रदेश की राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाने पर जोर।
राजेंद्र पाल गौतम: कांग्रेस-सपा गठबंधन को “बराबरी और आपसी सम्मान” के आधार पर बनाने की बात।
असदुद्दीन ओवैसी: विपक्षी दलों से बातचीत और भाजपा को सत्ता में लौटने से रोकने के लिए व्यापक राजनीतिक समझ की वकालत।
मायावती: सपा और कांग्रेस से दूरी तथा बसपा की स्वतंत्र राजनीतिक दिशा पर जोर।
योगी आदित्यनाथ: विकास परियोजनाओं, कानून-व्यवस्था, जनकल्याण और प्रदेशव्यापी जनसंपर्क के जरिए भाजपा की जमीन मजबूत करने पर जोर।
मुकाबला केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं, 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव केवल मोदी बनाम राहुल गांधी या योगी बनाम अखिलेश की लड़ाई नहीं होगा। असली मुकाबला “सामाजिक गठबंधनों, बूथ संगठन, उम्मीदवार चयन, सीट बंटवारे, महिला और युवा मतदाताओं तथा स्थानीय मुद्दों” का होगा। विपक्ष के पास 2024 लोकसभा चुनाव का अनुभव और सपा-कांग्रेस के सफल तालमेल की मिसाल है। लेकिन उसके सामने तीन बड़ी कमजोरियां हैं—सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारा, बसपा का अलग रहना और विपक्षी मतों के संभावित विभाजन का खतरा।
भाजपा के सामने भी चुनौतियां हैं। बेरोजगारी, युवाओं की अपेक्षाएं, जातीय असंतोष और 2024 में कमजोर हुआ लोकसभा प्रदर्शन विपक्ष को राजनीतिक अवसर दे रहा है। लेकिन योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत लोकप्रियता, कानून-व्यवस्था की छवि, सरकारी योजनाएं और व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क भाजपा की ताकत बने हुए हैं।
इसलिए उत्तर प्रदेश की आगामी लड़ाई को अभी से किसी एक पक्ष की जीत या हार मानना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर स्पष्ट है कि “विपक्ष मोदी-योगी की जोड़ी को सीधे निशाने पर रखकर चुनाव को “परिवर्तन बनाम निरंतरता” की लड़ाई बनाना चाहता है, जबकि भाजपा योगी के नेतृत्व में विकास, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी जवाब बनाकर मैदान में उतर रही है।“ आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा—क्या अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति और राहुल गांधी का सामाजिक न्याय अभियान एक साझा चुनावी मशीनरी में बदल पाएगा? यदि ऐसा हुआ तो 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव भाजपा के लिए बेहद कठिन मुकाबला बन सकता है। यदि विपक्षी एकता सीटों और वोटों में नहीं बदल पाई, तो भाजपा अपने संगठन और योगी सरकार के प्रदर्शन के आधार पर फिर बढ़त हासिल करने की कोशिश करेगी।
इंडिया ब्लॉक का आक्रमण और उत्तर प्रदेश चुनाव 2027: विपक्ष की व्यूह रचना भारतीय राजनीति के सबसे बड़े अखाड़े यानी उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर देश का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में अप्रत्याशित सफलता हासिल करने के बाद ‘इंडिया’ गठबंधन ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के डबल इंजन यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के किले में सेंध लगाने की पुख्ता प्लानिंग शुरू कर दी है। विपक्ष की यह आक्रामक रणनीति केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे अधिक आबादी वाला राज्य में हिंदुत्व और विकास के भगवा नैरेटिव को सामाजिक न्याय के चक्रव्यूह से घेरने की एक बड़ी कवायद है।
उत्तर प्रदेश चुनाव 2027: विपक्ष (इंडिया ब्लॉक) की मुख्य प्लानिंग और स्ट्रेटेजी
पीडीए बनाम कमंडल की काट:
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा गढ़ा गया ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्याक) फार्मूला इंडिया ब्लॉक का सबसे बड़ा वैचारिक अस्त्र बन चुका है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस फार्मूले ने भाजपा के कमंडल और हिंदुत्व के समीकरण को भारी नुकसान पहुंचाया था। 2027 के लिए विपक्ष की रणनीति इसी सामाजिक गठजोड़ को और अधिक प्रगाढ़ करने की है, जिसमें गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों के बड़े स्तर पर ध्रुवीकरण पर जोर दिया जा रहा है।
स्थानीय मुद्दे और एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी रुझान):
इंडिया ब्लॉक की रणनीति पीएम मोदी के राष्ट्रीय चेहरे के बरक्स सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार के कामकाज, स्थानीय स्तर पर नौकरशाही की पकड़, बेरोजगारी, महंगाई, और पेपर लीक जैसे युवाओं से जुड़े ज्वलनशील मुद्दों को आक्रामक रूप से उठाने की है। विपक्ष का मानना है कि उत्तर प्रदेश में जनता का एक वर्ग प्रशासन से नाराज है, जिसे सही दिशा में भुनाया जा सकता है।
जातिगत जनगणना और आरक्षण की सुरक्षा:
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार देश और प्रदेश में जातिगत जनगणना (Caste Census) का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। इंडिया ब्लॉक की रणनीति यह संदेश देने की है कि भाजपा सरकार पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के आरक्षण को कमजोर कर रही है, जिससे इन वर्गों में वैचारिक असंतोष पैदा किया जा सके।
बूथ स्तर पर माइक्रो कैपेसिटी मैनेजमेंट:
लोकसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित विपक्ष अब विधानसभा चुनाव के लिए भी पूरी तरह से सतर्क है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने आपसी समन्वय को मजबूत करते हुए अभी से बूथ कमेटियों को दुरुस्त करना शुरू कर दिया है ताकि एनडीए के मजबूत कैडर बेस को कड़ी टक्कर दी जा सके।
प्रमुख नेताओं के तीखे वक्तव्य और बयान उत्तर प्रदेश की जंग को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानों के तीर लगातार चल रहे हैं। प्रमुख नेताओं के वक्तव्य इस सियासी माहौल को साफ तौर पर बयां करते हैं:
अखिलेश यादव (राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी): “भारतीय जनता पार्टी सिर्फ नफरत और बांटने की राजनीति जानती है। जनता अब डबल इंजन सरकार के झांसे में आने वाली नहीं है। हमारा ‘पीडीए’ परिवार ही 2027 में उत्तर प्रदेश से इस अहंकारी सत्ता को उखाड़ फेंकेगा। जनता ने 2024 में ट्रेलर दिखाया था, 2027 में पूरी फिल्म रिलीज होगी।“
राहुल गांधी (कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सांसद):
“देश और उत्तर प्रदेश में संविधान पर लगातार हमले हो रहे हैं। युवा बेरोजगार घूम रहा है, पेपर लीक हो रहे हैं और सरकार अमीरों की तिजोरी भरने में व्यस्त है। इंडिया गठबंधन इस देश के गरीबों, पिछड़ों, दलितों और युवाओं को उनका हक दिलाकर ही रहेगा।“
योगी आदित्यनाथ (मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश – पलटवार ): “यह विपक्ष केवल जाति, परिवारवाद और दंगाइयों का समर्थन करने वाला गठबंधन है। जनता भूली नहीं है कि इनके शासनकाल में उत्तर प्रदेश की क्या स्थिति थी। आज राज्य माफिया मुक्त है, विकास के नए आयाम स्थापित हो रहे हैं। जनता इनके बहकावे में नहीं आने वाली और 2027 में एक बार फिर भारी बहुमत से कमल खिलेगा।“
विनोद तावड़े (भाजपा यूपी प्रभारी – विपक्ष के पीडीए पर): समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ का मतलब जनता समझ चुकी है। यह ‘पीडीए’ असल में ‘पराया धन अपना’ है, जिसे एनडीए कभी सफल नहीं होने देगा। भाजपा की नीति सबका साथ, सबका विकास और मजबूत संगठन की है, जिसके आगे विपक्ष के अवसरवादी गठबंधन की दाल नहीं गलेगी। उत्तर प्रदेश का 2027 का रण केवल एक विधानसभा चुनाव नहीं, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला एक बड़ा मोड़ बनने जा रहा है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक पकड़ व हिंदुत्व का चेहरा भाजपा का सबसे बड़ा संबल है, वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी और अखिलेश यादव की अगुवाई में ‘इंडिया ब्लॉक’ सामाजिक न्याय, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष के हथियारों से इस किले को ढहाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। आने वाले दिनों में यह राजनीतिक संघर्ष और अधिक आक्रामक होने की पूरी उम्मीद है।