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जल उठा फ्रांस

पेट्रोल-डीज़ल और महंगाई के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे साढ़े पांच लाख लोग, दंगों ने हिलाई मैक्रों सरकार

मुख्य बातें

  • गृह मंत्रालय के अनुसार 17 अक्टूबर को 5.5 लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे; यूनियनों का दावा 8 लाख
  • 2,500 से अधिक लोग हिरासत में; लगभग 1,000 सुरक्षाकर्मी घायल; एक प्रदर्शनकारी की मौत
  • 3,000 से अधिक दुकानें क्षतिग्रस्त या लूटी गईं; लिमोज़ का 143 साल पुराना टाउन हॉल जलकर खाक
  • एक साल में डीज़ल 44.1% महंगा; औसत कीमत लगभग €2.36 प्रति लीटर
  • पेरिस, लियोन, नीस, मार्सेई और उत्तरी शहरों में कर्फ़्यू; इस सप्ताहांत पुलिस की मदद के लिए सेना का सेंटिनेल बल तैनात होगा
France in trouble
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पेरिस | 21 अक्टूबर 2026

आगे की तारीखें: 24 और 31 अक्टूबर (येलो वेस्ट "एक्ट II") और 5 नवंबर को देशव्यापी यूनियन हड़ताल क्या हुआ


फ्रांस इस समय बीते कई वर्षों की सबसे गंभीर अशांति से गुज़र रहा है। शनिवार, 17 अक्टूबर को देश के दर्जनों शहरों में लाखों लोग पेट्रोल-डीज़ल की आसमान छूती कीमतों, बढ़ती महंगाई और बदहाल सरकारी सेवाओं के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे। गृह मंत्रालय ने लगभग 5.5 लाख प्रदर्शनकारियों की गिनती की, जिनमें 1.1 लाख अकेले पेरिस में थे। वहीं CGT यूनियन ने यह संख्या लगभग 8 लाख बताई ।


ज़्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे। लेकिन किनारों पर नकाबपोश गुटों ने पुलिस पर हमले किए, टाउन हॉल और दूसरी सरकारी इमारतों में घुसकर आग लगाई, लग्ज़री दुकानों और सुपरमार्केट को लूटा और पेरिस, मार्सेई, लियोन, लील और बोर्डो समेत कई शहरों में गाड़ियां और स्कूटर जलाए ।


पेरिस के प्रदर्शन के दौरान दिल का दौरा पड़ने से एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई, और रविवार को प्लास दे ला रिपब्लिक पर फिर झड़पें हुईं ।


स्कूल से शुरू होकर राष्ट्रीय आंदोलन तक।

सितंबर: आंदोलन पेरिस के उत्तरी मज़दूर-बहुल उपनगरों के हाई स्कूलों से शुरू हुआ, जहां छात्र शिक्षकों की कमी और जर्जर इमारतों का विरोध कर रहे थे।

सितंबर की शुरुआत: TikTok पर एक वायरल वीडियो ने ईंधन की कीमतों के खिलाफ़ 17 अक्टूबर को देशव्यापी प्रदर्शन की अपील की ।

अक्टूबर: छात्र, शिक्षक, अभिभावक, ट्रेड यूनियनें, किसान, पेंशनभोगी और फिर से सक्रिय हुए "येलो वेस्ट" (जिले जोन) गुट एक साथ आ गए।

17-18 अक्टूबर: यह राष्ट्रीय प्रदर्शन दशकों के सबसे बुरे दंगों में बदल गया।

19-20 अक्टूबर: कर्फ़्यू लगाए गए, संकट कैबिनेट की बैठक हुई और गृह मंत्री ने इस्तीफ़े की पेशकश की।


गुस्से के पीछे के आंकड़े


इसकी मुख्य वजह ईरान पर अमेरिका-इज़राइल का युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में आई बाधा है। आम तौर पर दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल इसी रास्ते से गुज़रता है ।


नुकसान का हिसाब


गिरफ़्तारियां: न्याय मंत्री जेराल्ड दरमानां के अनुसार सप्ताहांत में 2,330 से अधिक लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें लगभग 70% वयस्क थे । बाद में फ्रांसीसी मीडिया ने 2,513 लोगों की हिरासत की ख़बर दी ।


घायल: लगभग 1,000 पुलिसकर्मी, जेंडार्म और दमकलकर्मी घायल हुए। पुलिस के भीड़ नियंत्रण ग्रेनेड से एक प्रदर्शनकारी का हाथ उड़ गया।


कारोबार: प्रधानमंत्री लेकोर्नू के अनुसार कम से कम 3,000 दुकानों को नुकसान पहुंचा । चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अनुसार नुकसान "करोड़ों यूरो" में है।


विरासत: लिमोज़ का 143 साल पुराना टाउन हॉल जलकर लगभग नष्ट हो गया। बोर्डो में नकाबपोश भीड़ प्रीफ़ेक्ट के आवास में घुस गई।


सड़क से सत्ता तक: प्रमुख बयान


"हम इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि जीना बहुत महंगा हो गया है, ईंधन बहुत महंगा है, और देशभर में स्कूली छात्रों पर सिर्फ़ इसलिए हमले हो रहे हैं क्योंकि वे और शिक्षक और बेहतर पढ़ाई का माहौल मांग रहे हैं।"

— लोला, 19 वर्षीय प्रदर्शनकारी, पेरिस


"आज रात हम सब गुस्से और शर्म से भरे हैं।"

— राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, राष्ट्र के नाम संबोधन


"जिन्होंने तोड़ा है, उन्हें कीमत चुकानी होगी। जिन्होंने लूटा है, उन्हें लौटाना होगा। जिन्होंने गणतंत्र को गिराने की कोशिश की, उनकी जवाबदेही तय होगी।"

— इमैनुएल मैक्रों


"कुछ चीज़ें ठीक रहीं और कुछ बिगड़ गईं। व्यवस्था बहाल करने का मेरा संकल्प अटल है।"

— प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू


"शनिवार को कुछ बड़े शहरों में सैकड़ों दुकानें लुट जाने के बाद हम दुकानदारों से आंख मिलाकर यह नहीं कह सकते थे कि हालात हमारे नियंत्रण से बाहर नहीं गए।"

— गृह मंत्री लॉरों नुनेज़, जिनका इस्तीफ़ा मैक्रों ने अस्वीकार कर दिया


राजनीति: चुनाव से छह महीने पहले आरोप-प्रत्यारोप

यह अशांति अप्रैल-मई 2027 के राष्ट्रपति चुनाव से कुछ ही महीने पहले हो रही है। मैक्रों फिर से चुनाव नहीं लड़ सकते, और दौड़ में धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी उम्मीदवार आगे हैं ।


सरकार: लेकोर्नू ने "अति-वामपंथी" गुटों और अपराधियों को ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा: "कोई भी हिंसा के ज़रिए अपना राजनीतिक एजेंडा नहीं थोप सकेगा" ।


धुर-दक्षिणपंथ (नेशनल रैली): मरीन ले पेन ने कहा: "हिंसा कोई राय नहीं है। विनाश अभिव्यक्ति का तरीका नहीं है। और अराजकता फ्रांस का भविष्य नहीं हो सकती"। जॉर्डन बार्देला ने कहा कि सड़कों पर सिर्फ़ "अराजकता के पेशेवर" थे, "मेहनतकश फ्रांस" नहीं ।


धुर-वामपंथ (फ्रांस अनबाउड): ज़्यां-ल्यूक मेलांशों ने पेरिस में मार्च किया और लेकोर्नू पर "आग से खेलने" का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने कहा: "जो हमारे संघर्ष में साथ हैं, उनका लूटपाट या तोड़फोड़ से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए" ।


यूनियनें: CGT ने सरकार की "अराजकता की रणनीति" की निंदा की और 5 नवंबर की संयुक्त हड़ताल तक शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रखने की अपील की। उनकी मांग है वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी और संपत्ति कर (वेल्थ टैक्स) की वापसी।


मैक्रों पर सवाल: संकट के बीच कुवैत, यूएई, बहरीन और क़तर के तीन दिन के खाड़ी दौरे पर जाने के लिए राष्ट्रपति की आलोचना हो रही है ।


बड़ी बहसें

जायज़ गुस्सा या संगठित विद्रोह? सरकार और धुर-दक्षिणपंथ अति-वामपंथी नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं। वामपंथ का कहना है कि वेतन और महंगाई पर बात करने से बचने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया जा रहा है।


पुलिसिंग: मंत्रियों ने सुरक्षा और खुफ़िया चूक मानी है। वामपंथ पुलिस को टकराव बढ़ाने का दोषी मानता है, जबकि दक्षिणपंथ और सख़्ती चाहता है।


कर्फ़्यू और आपातकाल: लेकोर्नू ने "ज़रूरत पड़ने पर" आपातकाल का विकल्प खुला रखा है, लेकिन इसे "बड़ा राजनीतिक कदम" बताया है ।


सड़कों पर सेना: सेंटिनेल बल की तैनाती पर नागरिक स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं उठ रही हैं ।


कटौती बनाम राहत: भारी सरकारी कर्ज़ के बीच सरकार ईंधन, वेतन और स्कूलों पर कितना खर्च कर सकती है?


2018 की याद: येलो वेस्ट आंदोलन 2018 में ईंधन कर बढ़ाने की योजना के विरोध में शुरू हुआ था। सवाल यह है कि क्या 2026 उसकी पुनरावृत्ति है या उससे भी बड़ा आंदोलन।


सरकार ने अब तक क्या किया?

ईंधन: रणनीतिक भंडार से 10 मिलियन बैरल जारी किए गए। लक्ष्य है कि 1 नवंबर से तीन महीने तक डीज़ल 12-18 सेंट प्रति लीटर सस्ता हो ।

आपूर्ति: मैक्रों के कार्यालय के अनुसार यूएई और बहरीन से हर महीने 2 लाख टन अतिरिक्त डीज़ल का समझौता हुआ है ()।

कारोबारी राहत: प्रभावित दुकानों के लिए 100% सरकारी खर्च पर अस्थायी छुट्टी (फ़र्लो) और विशेष सहायता कोष ()।

कानून-व्यवस्था: स्थानीय कर्फ़्यू, मुख्य रूप से नाबालिगों के लिए, और त्वरित सुनवाई।

बातचीत: 21 अक्टूबर को यूनियनों और 22 अक्टूबर को राजनीतिक दलों के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय (मातिन्यों) में बैठक ()।

संभावित समाधान

# गाड़ी चलाने को मजबूर कामगारों, ट्रक चालकों, किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए लक्षित ईंधन सहायता।

#महंगाई के हिसाब से वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी, न्यूनतम वेतन (SMIC) में इज़ाफ़ा ।

# राहत के लिए पैसा जुटाने हेतु वेल्थ टैक्स या ऊर्जा कंपनियों के अप्रत्याशित मुनाफ़े पर कर ।

# स्कूलों के लिए आपात योजना: शिक्षकों की भर्ती और इमारतों की मरम्मत।

# ऊर्जा विविधीकरण: नए खाड़ी समझौते, अक्षय और परमाणु ऊर्जा का विस्तार।

# पारदर्शी पुलिसिंग: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसक गुटों में साफ़ अंतर।

# बातचीत में छात्रों को शामिल करना।


भारत के लिए क्यों अहम

वही तेल संकट: होर्मुज़ में आई जिस बाधा से फ्रांस में ईंधन महंगा हुआ है, उसका असर भारत पर भी पड़ता है, क्योंकि भारत अपना ज़्यादातर कच्चा तेल आयात करता है। फ्रांस की घटनाएं चेतावनी हैं कि ईंधन की महंगाई कैसे राजनीतिक अशांति में बदल सकती है।

पर्यटक और छात्र: फ्रांस में मौजूद या वहां जाने वाले भारतीयों को प्रदर्शन वाले इलाकों से दूर रहने, स्थानीय नियमों का पालन करने और दूतावास के संपर्क नंबर साथ रखने की सलाह दी गई है ।

आगे क्या देखें

21 अक्टूबर: यूनियनों की प्रधानमंत्री से बैठक ।

22 अक्टूबर: राजनीतिक दलों की प्रधानमंत्री से बैठक।

23 अक्टूबर: लेकोर्नू का लिमोज़ दौरा।

24 और 31 अक्टूबर: येलो वेस्ट "एक्ट II" प्रदर्शन।

अक्टूबर के अंत तक: स्कूलों से जुड़ी मांगों पर सरकारी फ़ैसले।

1 नवंबर: डीज़ल की कीमत में कटौती लागू।

5 नवंबर: देशव्यापी संयुक्त यूनियन हड़ताल।

विश्लेषण: सिर्फ़ कीमतों का नहीं, भरोसे का संकट।

कागज़ पर फ्रांस की 3.1% महंगाई दर बहुत ज़्यादा नहीं लगती। लेकिन एक साल में 44% महंगा हुआ डीज़ल सबसे ज़्यादा उन लोगों को चोट पहुंचाता है जिनके पास गाड़ी चलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है: ग्रामीण कामगार, ट्रक चालक, किसान और उपनगरों के परिवार। इसमें बदहाल स्कूल, दस साल के सुधारों से उपजी थकान और कार्यकाल के आख़िरी दौर में चल रहे राष्ट्रपति को जोड़ दें, तो ईंधन की कीमतें एक बड़े अन्याय-बोध की चिंगारी बन गईं। सरकार की पहली प्रतिक्रिया व्यवस्था पर केंद्रित रही है: कर्फ़्यू, सेना और त्वरित सुनवाई। मातिन्यों की बैठकों में वह कोई विश्वसनीय सामाजिक समझौता पेश कर पाती है या नहीं, इसी से तय होगा कि आंदोलन ठंडा पड़ेगा या 5 नवंबर तक और भड़केगा। राजनीतिक रूप से इस अराजकता का फ़ायदा दोनों छोरों को मिल रहा है। धुर-दक्षिणपंथ "व्यवस्था" बेच रहा है, धुर-वामपंथ "आक्रोश", और मध्यमार्गी सरकार के पास यह साबित करने के लिए छह महीने हैं कि वह सुरक्षा और राहत दोनों दे सकती है।


(श्रेय:+ Ouest-France; DW, Business Today, Le Monde live, RTL, New York Times, Government of France, CNBC, CBS News, Le Monde, The Independent, Politico, Reuters, Yahoo News, AFP via The Citizen,

BBC, RTL, AFP via The Citizen, EFE, Euronews, Le Progrès Le Figaro,