शारदीय नवरात्र 2026: नौ दिनों की पूजा-विधि, घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और नौ देवियों की आराधना
शारदीय नवरात्र 2026 का पावन पर्व 10 अक्टूबर से आरंभ हो रहा है। जानिए घटस्थापना का शुभ मुहूर्त, नौ देवियों की पूजा-विधि, दिनवार भोग और व्रत के नियम।
मुख्य बातें
- नवरात्र में व्रत कैसे रखें?
- नवरात्र स्थापना का शुभ मुहूर्त
- पूजन का क्रम
- नौ दिनों में किस देवी की पूजा करें और क्या भोग लगाएँ?
- अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की विधि

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नवरात्र केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का पावन अवसर है। इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। श्रद्धालु कलश स्थापना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र-जप, व्रत, कन्या पूजन और दान-पुण्य के माध्यम से माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
इस लेख में जानिए नवरात्र कब से प्रारंभ हो रहे हैं, कब समाप्त होंगे, घटस्थापना का शुभ समय क्या है और नौ दिनों में किस देवी की पूजा किस प्रकार करनी चाहिए। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्र का प्रारंभ रविवार, 11 अक्टूबर 2026 से होगा। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन घटस्थापना की जाएगी। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होगी और 19 अक्टूबर को महानवमी तथा 20 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) मनाया जाएगा।
नवरात्र स्थापना
रविवार, 11 अक्टूबर 2026
महानवमी
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
विजयादशमी एवं दशहरा
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
2. नवरात्र स्थापना का शुभ मुहूर्त
रविवार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना अर्थात कलश स्थापना की जाएगी। उपलब्ध पंचांग-आधारित प्रकाशित विवरणों के अनुसार सुबह का मुहूर्त और अभिजीत मुहूर्त दोनों विकल्प बताए गए हैं।
सुबह 6:19 से 10:12 बजे तक सुबह 11:44 से दोपहर 12:31 बजे तक
घटस्थापना की संपूर्ण पूजा-विधि
नवरात्र के पहले दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करके माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
आवश्यक पूजा सामग्री
- मिट्टी का पात्र और शुद्ध मिट्टी
- जौ के बीज
- तांबे या मिट्टी का कलश
- शुद्ध जल अथवा गंगाजल
- आम के पत्ते और नारियल
- रोली, मौली, अक्षत और हल्दी
- लाल चुनरी, पुष्प और माला
- धूप, दीपक, घी और रुई की बत्ती
- फल, मिठाई और अन्य नैवेद्य
पूजन का क्रम
- पूजा स्थान पर मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर जौ बोएँ।
- कलश में जल भरें और परंपरा के अनुसार उसमें अक्षत, सुपारी तथा सिक्का रखें।
- कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाकर नारियल स्थापित करें। नारियल पर लाल वस्त्र या मौली बाँध सकते हैं।
- कलश को जौ वाले पात्र के पास स्थापित करें और माँ दुर्गा का ध्यान करें।
- गणेश जी का स्मरण करके संकल्प लें कि आप श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार नौ दिनों तक पूजा करेंगे।
- माँ दुर्गा को रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या देवी के मंत्रों का पाठ करके आरती करें।
कलश स्थापना को नवरात्र पूजा का महत्वपूर्ण आरंभिक संस्कार माना जाता है।
4. नौ दिनों में किस देवी की पूजा करें और क्या भोग लगाएँ?
नवरात्र के प्रत्येक दिन माँ दुर्गा के एक विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है। नीचे दिनवार पूजा, मंत्र और पारंपरिक भोग का विवरण दिया गया है।
पहला दिन — 11 अक्टूबर, माँ शैलपुत्री
पूजा का भाव: स्थिरता, साहस और शुभ आरंभ
मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।
भोग: गाय का घी या घी से बना सात्त्विक प्रसाद।
उपाय: पूजा में सफेद पुष्प अर्पित करें और मन को शांत रखकर प्रार्थना करें।
दूसरा दिन — 12 अक्टूबर, माँ ब्रह्मचारिणी
पूजा का भाव: तप, संयम और धैर्य
मंत्र: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।
भोग: शक्कर और मिश्री।
उपाय: इस दिन क्रोध से बचें और कुछ समय ध्यान या मंत्र-जप में बिताएँ।
तीसरा दिन — 13 अक्टूबर, माँ चंद्रघंटा
पूजा का भाव: निर्भयता और आत्मबल
मंत्र: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः।
भोग: दूध, खीर या दूध से बनी मिठाई।
उपाय: देवी से भय दूर करने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रार्थना करें।
चौथा दिन — 14 अक्टूबर, माँ कूष्मांडा
पूजा का भाव: ऊर्जा, स्वास्थ्य और उत्साह
मंत्र: ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः।
भोग: मालपुआ या अपनी परंपरा के अनुसार मीठा प्रसाद।
उपाय: जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या फल दान करें।
पाँचवाँ दिन — 15 अक्टूबर, माँ स्कंदमाता
पूजा का भाव: मातृत्व, स्नेह और परिवार की मंगलकामना
मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः।
भोग: केला या केले से बना प्रसाद।
उपाय: माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करें।
छठा दिन — 16 अक्टूबर, माँ कात्यायनी
पूजा का भाव: साहस, संकल्प और धर्म की रक्षा
मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।
भोग: शहद।
उपाय: अपने संकल्पों को दोहराएँ और किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
सातवाँ दिन — 17 अक्टूबर, माँ कालरात्रि
पूजा का भाव: भय पर विजय और नकारात्मकता से मुक्ति की प्रार्थना
मंत्र: ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।
भोग: गुड़ या गुड़ से बना प्रसाद।
उपाय: दीपक जलाकर प्रार्थना करें और मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें।
आठवाँ दिन — 18 अक्टूबर, माँ महागौरी
पूजा का भाव: शांति, पवित्रता और सद्बुद्धि
मंत्र: ॐ देवी महागौर्यै नमः।
भोग: नारियल या नारियल से बना प्रसाद।
उपाय: अपनी परंपरा के अनुसार कन्या पूजन अष्टमी को कर सकते हैं।
नौवाँ दिन — 19 अक्टूबर, माँ सिद्धिदात्री
पूजा का भाव: ज्ञान, सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति
मंत्र: ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।
भोग: हलवा, पूरी, चना या अन्य सात्त्विक प्रसाद।
उपाय: कन्या पूजन, दान और अपनी सामर्थ्य के अनुसार हवन करके नवरात्र साधना पूर्ण करें।
नोट: भोग की सामग्री और पूजा का क्रम अलग-अलग क्षेत्रीय एवं पारिवारिक परंपराओं में भिन्न हो सकता है। उपर्युक्त भोग प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
5. नवरात्र में व्रत कैसे रखें?
नवरात्र में व्रत रखने का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन, वाणी और व्यवहार को संयमित करना भी है।
- प्रातः स्नान करके माता रानी के सामने व्रत का संकल्प लें।
- अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या सात्त्विक भोजन करें।
- फल, दूध, मखाना, साबूदाना और कुट्टू जैसे व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थ अपनी परंपरा के अनुसार लें।
- नियमित रूप से दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या देवी मंत्र का पाठ करें।
- किसी के प्रति कटु वचन, क्रोध और द्वेष से बचने का प्रयास करें।
- जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या उपयोगी सामग्री दान करें।
गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को कठोर उपवास करने के बजाय अपनी आवश्यकताओं के अनुसार भोजन करना चाहिए।
6. अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की विधि
नवरात्र के आठवें या नौवें दिन कन्या पूजन करने की परंपरा है। इसे देवी शक्ति के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।
- कन्याओं को सम्मानपूर्वक घर आमंत्रित करें।
- स्वच्छ स्थान पर बैठाकर उनके पैर धोने की पारंपरिक विधि अपनी श्रद्धा के अनुसार अपनाएँ।
- रोली और अक्षत से तिलक करें तथा पुष्प अर्पित करें।
- हलवा, पूरी, चना और अन्य सात्त्विक भोजन प्रेमपूर्वक खिलाएँ।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपयोगी उपहार दें।
- कन्याओं का आशीर्वाद लेकर उन्हें आदरपूर्वक विदा करें।
कन्या पूजन में बच्चों की गरिमा, स्वच्छता और सहजता का विशेष ध्यान रखें। इसे केवल रस्म न मानकर कन्याओं के प्रति सम्मान के भाव से करें।