प्रेस क्लब में हंगामा: अभिजीत दीपके-नेहा बोरा की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों बनी सुर्खियों का केंद्र?
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस बहस और नारेबाजी का मंच बन गई।
मुख्य बातें
- प्रेस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य
- कैसे शुरू हुआ विवाद?
- मुख्य आरोप और मांगें
- एयरपोर्ट पर भी विवाद
- विश्लेषण: प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों मायने रखती है?

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस बहस और नारेबाजी का मंच बन गई। रिपब्लिक टीवी की रिपोर्टर्स द्वारा कथित रूप से बोलने में बाधा डालने और हंगामा करने के आरोपों के बाद मौके पर तेज नारेबाजी हुई, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए।प्रेस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य
यह प्रेस कॉन्फ्रेंस 15 अक्टूबर को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित की गई थी। इसका मकसद CJP की अगले दिन यानी 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में “लहराओ तिरंगा” प्रदर्शन के लिए समर्थन जुटाना और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ आरोपों को उठाना था।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेहा बोरा और अभिजीत दीपके के अलावा वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण, अभिनेता-कार्यकर्ता प्रकाश राज, SFI नेता आइशी घोष और तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष शेख सलाउद्दीन भी मौजूद थे।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
बीबीसी हिंदी के अनुसार, जैसे ही नेहा बोरा बोलना शुरू करने लगीं, मौके पर कुछ लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। उन्हें “बंद करो” और “दफा हो जाओ” जैसे नारे सुनाए गए, जिसके बाद उन्हें अपना संबोधन रोकना पड़ा।
बोरा और दीपके ने प्रेस क्लब के पदाधिकारियों से हंगामा करने वालों को बाहर करने की अपील की। दूसरी ओर, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि रिपब्लिक टीवी की रिपोर्टर्स ने नेहा बोरा के भाषण के तुरंत बाद सवाल उठाने और बहस करने की कोशिश की, जिसके बाद मौजूद अन्य पत्रकारों ने उन्हें बाहर निकाला।
यह घटना तब हुई जब नेहा बोरा पुलिस कार्रवाई, पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और मतदाता सूची से नाम हटने के मुद्दों पर बोल रही थीं। शोर बढ़ने के बाद दीपके को भी बीच में उठकर माहौल शांत कराना पड़ा।
मुख्य आरोप और मांगें
प्रेस कॉन्फ्रेंस में CJP और समर्थक संगठनों ने कई बड़े मुद्दे उठाए। इनमें मुख्य रूप से SIR प्रक्रिया, जंतर मंतर से प्रदर्शन स्थल हटाए जाने और प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी शामिल हैं।
- CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की।
- आयोजकों ने CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास समेत सभी गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई मांगी।
- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई बंद करने की मांग रखी गई।
- जंतर मंतर को फिर से प्रदर्शन स्थल के रूप में बहाल करने की बात कही गई।
- नेहा बोरा ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन कवर कर रहे पत्रकारों के कैमरे छीने गए और उन्हें कैमरा वापस न मिलने की धमकी दी गई।
अभिजीत दीपके के बयान
अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सरकार प्रदर्शनकारियों पर दमन की नीति अपना रही है। उन्होंने कहा, “नरेंद्र मोदी एक तानाशाह बन चुके हैं, लेकिन उनमें इमरजेंसी लगाने की हिम्मत नहीं है।”
दीपके ने जंतर मंतर पर तिरंगा लेकर पहुंचने पर CJP के दो नेताओं की गिरफ्तारी का हवाला देते हुए पूछा, “तिरंगा लहराना कब से अपराध हो गया?” उन्होंने यह भी कहा कि यह देश गांधी के विचारों और बाबा साहब आंबेडकर के संविधान पर चलेगा।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच संबंध पर सवाल उठाते हुए कहा, “नरेंद्र मोदी के लिए ज्ञानेश कुमार तिरंगे से ज्यादा क्यों अहम हो गए हैं?”
नेहा बोरा का आरोप
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि SIR के खिलाफ आंदोलन किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि वोट के अधिकार की लड़ाई है। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली से लेकर मुंबई तक यह आंदोलन फैल रहा है और हिरासत या मारपीट से इसे रोका नहीं जा सकता।
बोरा ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार कर रही है। उन्होंने कहा, “हमने देखा कि पत्रकारों से कैमरे छीने गए और कहा गया कि अगर वे प्रदर्शन कवर करते रहे तो कैमरे वापस नहीं मिलेंगे।”
एयरपोर्ट पर भी विवाद
प्रेस क्लब की घटना से पहले अभिजीत दीपके को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी विरोध का सामना करना पड़ा था। कुछ यात्रियों ने उन पर “चोर-चोर” के नारे लगाए और एक व्यक्ति ने पूछा, “क्यों देश को खराब कर रहा है?”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दीपके को एयरपोर्ट से बाहर निकलते समय भीड़ ने घेरा और सुरक्षाकर्मियों व पुलिस ने हस्तक्षेप किया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ।
विश्लेषण: प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों मायने रखती है?
यह घटना केवल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुए हंगामे तक सीमित नहीं है। यह दिखाती है कि SIR, प्रदर्शन की आजादी, पुलिस कार्रवाई और मीडिया की भूमिका को लेकर देश में राजनीतिक तनाव कितना गहरा हो चुका है।
CJP और AISA का तर्क है कि यह आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए है, जबकि बीजेपी इसे विपक्ष की सड़क की राजनीति बताती है। बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने पहले कहा था कि सरकार शांतिपूर्ण विरोध के खिलाफ नहीं है, लेकिन प्रदर्शन को राजनीतिक दबाव का हथियार नहीं बनाया जा सकता।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है और ड्राफ्ट चरण में हटाए गए नामों को अंतिम रूप से हटा हुआ नहीं माना जा सकता। आयोग के अनुसार, पात्र मतदाता फॉर्म 6 के जरिए दोबारा सूची में शामिल हो सकते हैं।
जांच का पहलू
अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रेस क्लब में हंगामा करने वाले लोग किस संगठन या समूह से जुड़े थे। इसी तरह, रिपब्लिक टीवी की रिपोर्टर्स पर लगाए गए आरोपों और उन्हें बाहर निकाले जाने की घटना की पूरी पृष्ठभूमि अभी सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हुई है।
पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार, कैमरे जब्त करने और महिला पत्रकार से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है। नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस के ACP विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली पत्रकार के खिलाफ काउंटर FIR का भी हवाला दिया, जिसे अभी कानूनी प्रक्रिया में तय होना बाकी है।
आगे क्या होगा?
CJP ने 16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में “लहराओ तिरंगा” प्रदर्शन का आह्वान किया है। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सतर्कता बरतने का संकेत दिया है।
इस घटना के बाद यह देखा जाएगा कि प्रेस क्लब जैसे संस्थागत मंचों पर मीडिया की स्वतंत्रता और प्रेस कॉन्फ्रेंस की गरिमा कैसे बनाए रखी जाती है। साथ ही, SIR विवाद और प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक और कानूनी स्तर पर और तेज हो सकता है।
निष्कर्ष
अभिजीत दीपके और नेहा बोरा की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुआ हंगामा दिखाता है कि देश में चुनावी प्रक्रिया, प्रदर्शन की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो रही है। दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप अभी जांच और साक्ष्य के दायरे में रहकर देखे जाने चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध को संवाद के मंच पर लाया जाएगा, या नारेबाजी, हंगामा और वायरल वीडियो ही बहस का नया तरीका बनते जाएंगे। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना संवाद और पत्रकारिता की स्वतंत्रता।