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जंतर-मंतर से प्रदर्शन हटने की पूरी कहानी

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर 2026 के निर्देश के बाद जंतर-मंतर को नियमित प्रदर्शन-स्थल की सूची से हटा दिया है

मुख्य बातें

  • घटनाक्रम: कैसे शुरू हुआ विवाद
  • सुप्रीम कोर्ट का 9 अक्टूबर का आदेश
  • अदालत के मुख्य निर्देश
  • दिल्ली पुलिस की नई व्यवस्था
  • राजनीतिक टकराव और हिरासतें
Protest site removed from protesters
Protest site removed from protesters · chat gpt AI

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर 2026 के निर्देश के बाद जंतर-मंतर को नियमित प्रदर्शन-स्थल की सूची से हटा दिया है और रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड तथा पूर्वी दिल्ली का CBD ग्राउंड नए प्रदर्शन स्थल घोषित किए हैं। इस फैसले से राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।

घटनाक्रम: कैसे शुरू हुआ विवाद

जंतर-मंतर वर्षों से दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन का प्रतीक रहा है। यहाँ किसान, छात्र, महिला संगठन, सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक दल अपनी मांगें उठाते रहे हैं, क्योंकि यह संसद, सरकारी दफ्तरों और मीडिया के केंद्र से नजदीक है।

अक्टूबर 2026 में CJP नामक समूह और कुछ छात्र संगठनों ने जंतर-मंतर की ओर प्रदर्शन का आह्वान किया। पुलिस ने भारी बल तैनात किया, कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और यातायात, मेट्रो सेवाओं तथा कुछ स्थानों पर इंटरनेट तक पहुंच पर प्रतिबंध लगाए।

10–11 अक्टूबर के सप्ताहांत में सैकड़ों प्रदर्शनकारी गिरफ्तार या रोके गए। पुलिस का तर्क था कि ये कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने और यातायात में अवरोध रोकने के लिए थे, जबकि प्रदर्शनकारियों ने इसे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर हमला बताया।

सुप्रीम कोर्ट का 9 अक्टूबर का आदेश

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला 10 अक्टूबर के प्रदर्शन की आशंका में मेट्रो और अन्य सेवाओं के निवारक बंद होने को चुनौती देने वाली याचिका से उठा। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण और कानूनी प्रदर्शन करने वालों को बुनियादी सुविधाएं देने का समय आ गया है।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह अभिलेखित किया कि प्रदर्शनकारियों के लिए ऐसे उपयुक्त वैकल्पिक स्थल खोजे और नामित किए जाएं, जिनमें आवश्यक बुनियादी ढांचा—जैसे पेयजल, शौचालय, चिकित्सा सहायता, बैठने की व्यवस्था और सुरक्षा—हो सके।

अदालत के मुख्य निर्देश

  • सक्षम प्राधिकारी को जंतर-मंतर के स्थान पर उपयुक्त वैकल्पिक प्रदर्शन-स्थल पर विचार करने और उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।
  • नए स्थलों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं होनी चाहिए।
  • अदालत ने सीधे जंतर-मंतर को स्थायी रूप से बंद करने का आदेश नहीं दिया; उसने वैकल्पिक स्थल पर विचार करने कहा था।
  • यह आदेश 2018 के Mazdoor Kisan Shakti Sangathan v. Union of India फैसले की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर संपूर्ण प्रतिबंध को अस्वीकार किया था और कहा था कि प्रदर्शन का अधिकार संविधान का हिस्सा है।

दिल्ली पुलिस की नई व्यवस्था

विषय पहले अब

मुख्य प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड, CBD ग्राउंड

आधार वर्षों पुरानी प्रथा और पुलिस का स्टैंडिंग ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के निर्देश और गृह मंत्रालय की समिति की

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नियम जंतर-मंतर हेतु अलग दिशा-निर्देश तीनों नए स्थलों के लिए विस्तृत SOP अलग से जारी होगा

प्रभाव केंद्रीय दिल्ली में पहुंच और दृश्यता अधिक प्रदर्शन दूर के स्थानों पर, यातायात प्रबंधन आसान होगा

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर के स्टैंडिंग ऑर्डर में जंतर-मंतर को डी-नोटिफाई किया गया। पुलिस ने कहा कि नए स्थलों के लिए विस्तृत और संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया—SOP—बाद में जारी की जाएगी।

राजनीतिक टकराव और हिरासतें

CJP के प्रदर्शन के दूसरे दिन पुलिस ने 200 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की बात कही गई। कई प्रदर्शनकारियों को पुलिस बसों में ले जाया गया, जिससे विपक्षी दलों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार पर दमन का आरोप लगाया।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने CJP नेताओं की रिहाई की मांग की और कहा कि प्रदर्शन स्थल तक पहुंच, सार्वजनिक परिवहन तथा मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध असंगत हो सकते हैं।

पुलिस ने अदालत में कहा कि जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी, वहां दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 का उपयोग कर उन लोगों को हटाया गया, जिन्होंने कानूनी आदेशों का पालन करने से इनकार किया।

कानूनी चुनौतियां

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता स्वाति सिंह की ओर से एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें 11 अक्टूबर के स्टैंडिंग ऑर्डर को चुनौती दी गई है। याचिका का कहना है कि प्रदर्शन को दूर के इलाकों में भेजने से शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार के सामने असहमति रखने का अधिकार प्रभावी रूप से कमजोर हो सकता है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि प्रदर्शन की जगह केवल प्रशासनिक मामला नहीं है; संसद, सचिवालय या सरकारी दफ्तरों के पास होना प्रदर्शन की प्रभावशीलता के लिए जरूरी है। यह भी कहा गया कि नए स्थलों के लिए SOP अभी जारी नहीं होने से नागरिकों के सामने अनिश्चितता है।

दिल्ली हाई कोर्ट में भी इंडियन यूथ कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई हुई। जस्टिस अमित महाजन ने पुलिस से 17 नवंबर तक जवाब मांगा और कहा कि जंतर-मंतर को हटाने के बाद बचा मुद्दा अधिकतर “शैक्षणिक” प्रकृति का है; फिर भी नए नियमों और प्रतिबंधों की उचितता पर सुनवाई जारी रहेगी।

असल विवाद क्या है?

सरकार और पुलिस का तर्क है कि जंतर-मंतर संकरे सड़कों और व्यस्त क्षेत्र में है, जहाँ बड़े प्रदर्शन से यातायात रुकता है और सुरक्षा चुनौती पैदा होती है। नए स्थलों पर बेहतर सुविधा, बड़ी क्षमता और कम व्यवधान की संभावना है।

विरोध करने वालों का तर्क है कि प्रदर्शन केवल “जगह” नहीं, बल्कि नागरिकों की आवाज सरकार तक पहुंचाने का साधन है। जंतर-मंतर को हटाने से प्रदर्शन दूर और कम दिखने वाले स्थानों तक सीमित हो सकता है, जिससे लोकतांत्रिक विरोध की दृश्यता घट सकती है।

आगे क्या होगा?

अब असली परीक्षा यह होगी कि नए स्थलों के लिए SOP कितना उदार, स्पष्ट और संविधान-सम्मत होता है। अदालत को यह तय करना होगा कि वैकल्पिक स्थल देना प्रदर्शन के अधिकार का उचित नियमन है, या दूरी और शर्तों के जरिए उस अधिकार को व्यावहारिक रूप से सीमित करना।

जंतर-मंतर का यह मामला केवल एक सड़क या मैदान का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में विरोध की जगह, पहुंच और दृश्यता का मामला बन चुका है।

(श्रेय: Indian Express, Amnesty, Telegraph India, Live law)