दिल्ली में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च: गिरफ्तारियां, चुनाव आयोग पर बहस और कानूनी सवाल
16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस, मंडी हाउस और जंतर मंतर के आसपास प्रदर्शन का सिलसिला चला। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी संघ (AISA) सहित कई छात्र संगठनों ने अलग प्रदर्शन किए
मुख्य बातें
- क्या हुआ?
- पुलिस और प्रदर्शनकारियों के तर्क
- रिचा चड्ढा का बयान
- चुनाव आयुक्त हटाया जा सकता है या नहीं?
- विवाद और आरोप

नई दिल्ली। 16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस, मंडी हाउस और जंतर मंतर के आसपास प्रदर्शन का सिलसिला चला। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी संघ (AISA) सहित कई छात्र संगठनों ने अलग प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) रोका जाए और 2023 का चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून वापस लिया जाए।
क्या हुआ?
दिल्ली पुलिस ने मार्च से पहले CJP संस्थापक अभिजीत दिपके को झंडेवालान के पास और AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को मंडी हाउस के पास निवारक नजरबंदी में लिया। रिपोर्ट्स के अनुसार 100 से अधिक, कुछ खबरों में लगभग 150 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
पुलिस ने CJP की मुख्य सभा की अनुमति BNSS की धारा 163 के तहत खारिज कर दी थी। इसके बावजूद कनॉट प्लेस में कई जगह फ्लैश प्रोटेस्ट हुए और प्रदर्शनकारियों ने तिरंगा फहराया।
17 अक्टूबर की सुबह नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत औपचारिकताएं पूरी करने के बाद रिहा कर दिया गया। अभिजीत दिपके निवारक हिरासत में रहे और विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश होने थे।
पुलिस और प्रदर्शनकारियों के तर्क
पुलिस का पक्ष है कि अनुमति न मिलने के बावजूद भीड़ इकट्ठा करने और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को देखते हुए निवारक कार्रवाई की गई। रिपोर्ट्स में नई दिल्ली जिले में 25,000 से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती का उल्लेख है।
प्रदर्शनकारी पक्ष का आरोप है कि शांतिपूर्ण विरोध को रोकने के लिए कार्यकर्ताओं को पहले से हिरासत में लिया गया। AISA ने दावा किया कि नेहा बोरा को अज्ञात स्थान पर ले जाया गया; पुलिस ने उन्हें बाद में रिहा किया।
रिचा चड्ढा का बयान
अभिनेत्री रिचा चड्ढा ने सोशल मीडिया पर लिखा, “प्रिय प्रदर्शनकारियों, चूंकि आपकी अनुमति के बिना आपको फिल्माया जा रहा है, तो सर्विलांस/फेशियल रिकग्निशन कैमरों से बचने के लिए मेकअप आजमाएं।” उन्होंने प्रदर्शनकारियों से शांत रहने और हिंसा से बचने की भी अपील की।
चुनाव आयुक्त हटाया जा सकता है या नहीं?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह और उसी आधार पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है—यानी सिद्ध दुराचरण या असमर्थता के आधार पर।
इसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव जरूरी है। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो, तो जांच समिति बनती है और दोनों सदनों में विशेष बहुमत—कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वालों में से दो-तिहाई बहुमत—चाहिए।
इसलिए विपक्ष या प्रदर्शनकारी इस्तीफे की मांग कर सकते हैं, लेकिन बिना संवैधानिक प्रक्रिया के CEC को हटाया नहीं जा सकता। यह सुरक्षा इसलिए दी गई है कि चुनाव आयोग पर सत्ता या राजनीतिक दबाव का असर न हो।
विवाद और आरोप
सरकार समर्थक पक्ष कहता है कि चुनावी रोल की सफाई और SIR लोकतंत्र मजबूत करने के लिए है, जबकि विपक्ष और प्रदर्शनकारी इसे मतदाताओं के अधिकारों पर हमला बताते हैं। यह बहस अभी कानूनी, राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर जारी है।
CJP के विदेशी फंडिंग, “डीप स्टेट” या भारत में अस्थिरता पैदा करने की “साजिश” से जुड़े दावे अभी सार्वजनिक रिपोर्टिंग से सिद्ध नहीं हैं। ऐसे आरोपों को “दावा/आरोप” कहकर ही प्रकाशित करें, जब तक कोई आधिकारिक जांच, अदालती दस्तावेज या प्रमाणित वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध न हो।
सुरक्षा का पहलू
कनॉट प्लेस दिल्ली का व्यस्ततम वाणिज्यिक क्षेत्र है, इसलिए बड़ी भीड़, यातायात रुकावट और संभावित टकराव को देखते हुए भारी सुरक्षा तैनात की गई। साथ ही, निवारक हिरासत के उपयोग पर भी सवाल उठते हैं: नागरिक अधिकारों के पक्ष में यह देखा जाता है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित है, जबकि प्रशासन का तर्क होता है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना भी उसकी जिम्मेदारी है।
(श्रेय:- newindianexpress, indianexpress, business-standard, english.mathrubhumi, theshillongtimes, X)