विनोद यादव का निलंबन नहीं बर्खास्तगी हो

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प्रतापगढ़ जनपद के जेठवारा थानांतर्गत दो दिन पहले घटी एक घटना जिसमें एक थानाध्यक्ष  पीड़ित को जमकर गालियां दे रहा है हालांकि उसके ऊपर निलंबन की कार्रवाई भी हो चुकी है कुछ संगठन और आप नेत्री नूतन ठाकुर ने एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की है,इस घटना  ने शांतिप्रिय लोगों को झकझोर कर रख दिया है। घटना को खुद कानून के रखवाले थानाध्यक्ष विनोद यादव ने ही अंजाम दी है। इलाके के एक पीड़ित के मदद की गुहार लगाने पर उन्होंने न सिर्फ उसको माँ, बहन और बेटी तक की गालियां दी, बल्कि उसकी जाति तक को भी नहीं बख्शा। बाद में जब उनकी ‘करनी’ का वीडियो वायरल हो गया तो उन्हें लगा यह तो गड़बड़ हो गया। एक पत्रकार से सफाई देते हुए यह भी बोल गए कि काम के बोझ के चलते ऐसी गलती हो गई। उनका यह कथन उनकी उससे भी बड़ी गलती है। यह कहकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि दबाव में वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। तो क्या ऐसा कोई व्यक्ति सरकारी सेवा में इस तरह के किसी जिम्मेदार पद पर रहने लायक है, जो दबाव में परिस्थितियों का सामना करने के बजाय अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठे। विचारणीय बात ये है कि ऐसे गैरजिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ बर्खास्तगी की मांग करना किसी जाति के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं, बल्कि जिम्मेदार पद पर बैठे उस व्यक्ति के खिलाफ है जो  दायित्व निर्वहन का मौका आने पर अपना आपा ही खो बैठता है। पीड़ित व्यक्ति के समाज से जुड़े लोगों को भी यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी की जिसके खिलाफ कार्रवाई की मांग हो रही है, वह मदद मांगने पर किसी भी वर्ग, जाति, धर्म के लोगों के खिलाफ इसी तरह की अशोभनीय टिप्पणी कर सकता है। यहां तक कि अपनी भी जाति के लोगों को नहीं बख्श सकता। ऐसी ओछी मानसिकता के लोग शान्ति व्यवस्था तो भंग कर सकते हैं, लेकिन शांति स्थापित नहीं कर सकते। यहां सवाल ब्राह्मण समाज को गाली देने का नहीं है। सवाल कानून-व्यवस्था का है। थानाध्यक्ष अपने क्षेत्र का बादशाह होता है। पीड़ित और परेशान व्यक्ति न्याय मांगने इन्हीं के पास पहले जाता है। सोचिये अगर इस मानसिकता के लोग थानाध्यक्ष होंगे तो क्या कोई पीड़ित और परेशान व्यक्ति ऐसे थानाध्यक्ष से न्याय की गुहार लगाने का साहस कर सकेगा। निलंबित थानाध्यक्ष की ओर से दी गई सफाई का वीडियो ध्यान से सुनिये। वह खुद कह रहे हैं कि काम के बोझ से वह इतना परेशान थे कि उनके मुंह से यह सब निकल गया। मतलब साफ है कि काम के बोझ से वह अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं। उस दिन कोई ब्राह्मण ही नहीं, कोई भी पीड़ित उनसे न्याय की गुहार लगाता तो वह उसके भी साथ वैसे ही पेश आते। न्याय की गुहार लगाने वाला पीड़ित किसी भी जाति या धर्म का होता। यहां तक कि खुद उनकी ही जाति का व्यक्ति अगर मदद के लिए फोन किया होता तो वह उसको भी उसी तरह की गालियों से नवाजते। “क्योंकि वह काम के बोझ के चलते परेशान थे और अपना आपा खो चुके थे, ऐसा उन्होंने खुद पत्रकार से स्वीकार किया है।” अब सवाल यह उठता है कि क्या इतनी जल्दी मानसिक संतुलन खो बैठने वाला व्यक्ति पुलिस सेवा में रहने के काबिल है ? क्योंकि पुलिस तो ऐसा विभाग ही है, जहां आये दिन ऐसी दर्जनों घटनाएं होती ही रहती हैं। पीड़ित लोग न सिर्फ फोन से मदद मांगते हैं, बल्कि आधी रात को भी थाने पहुंच जाते हैं। अगर एक थानाध्यक्ष घटनाओं से इतनी जल्दी विचलित होकर अपना आपा खो बैठेगा तो वह मदद क्या करेगा ? विनोद यादव जैसे इंस्पेक्टर के कृत्यों से तो यही लगता है कि वह पीड़ित को ही लॉकअप में डालकर खुद सोने चला जाए।ऐसे ही पुलिसकर्मी या जिम्मेदार अधिकारी समाज मे जाति संघर्ष, वर्ग संघर्ष और साम्प्रदायिक हिंसा के लिए जिम्मेदार होते हैं। आज समाज में हिंसा, लूट, हत्या, बलात्कार की जो घटनाएं बढ़ी हैं, उसके लिए इसी तरह के अकर्मण्य और कुंठित मानसिकता के अधिकारी जिम्मेदार होते हैं। मगर सजा उस इलाके की निर्दोष जनता को मिलती है। समय से अगर दोषियों पर पुलिस कार्रवाई कर दे तो बहुत से अपराध अपने आप खत्म हो जाएं। मगर समय पर पुलिस अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती और जब हालात बेकाबू हो जाते हैं, तब निर्दोष जनता पर उसकी लाठियां बरसती हैं। जिस दिन यह कानून बन जाएगा कि किसी पक्ष से मिले आवेदन पत्र पर कार्रवाई न होने से हत्या आदि की बड़ी घटनाएं होती हैं तो इलाके के थानाध्यक्ष के खिलाफ भी आरोपियों की ही तरह आईपीसी की धाराओं में मुकदमा दर्ज होगा। यकीन मानिए उस दिन से बहुत सी घटनाएं होने से बच जाएंगी। इसलिए हम सभी को यह समझना होगा कि निलंबित थानाध्यक्ष के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई इसलिए नहीं होनी चाहिए कि उसने किसी पीड़ित ब्राह्मण या समूचे ब्राह्मण समाज को गाली दी है, बल्कि बर्खास्तगी की कार्रवाई इसलिए होनी चाहिए कि उस पीड़ित की जगह यदि कोई व्यक्ति यादव, क्षत्रिय, मुस्लिम, दलित आदि समाज का भी होता तो वह उसके साथ भी यही बर्ताव करता। क्यों कि यह बात एक ऑडियो में वह खुद ही स्वीकार कर चुका है कि घटनाओं से परेशान होने के कारण ऐसा हो गया। सोचिये जो व्यक्ति कुछ घटनाओं से परेशान होकर अपना आपा खो बैठे क्या वह किसी जाति, वर्ग, धर्म आदि के पीड़ित की ऐसे मौकों पर मदद कर सकता है ? अहम प्रश्न यह है। पीड़ित ब्राह्मण या ब्राह्मण समाज को गाली देना कोई बड़ा प्रश्न नहीं है। एक बात और स्पष्ट हो जानी चाहिए कि कोई भी इंसान जब किसी की माँ और बहन को गाली देता है तो क्या वह भूल जाता है कि उसे भी तो माँ बहन है और ऐसे ही गाली उसे कोई देगा तो उसे कैसा लगेगा ? उसकी प्रतिक्रिया बदले स्वरूप क्या होगी ? जिस तरह एक नशा से धुत ब्यक्ति अपनी माँ बहन तो पहचानता है और सामने वाले को जी भरकर गरियाता है, ठीक उसी तरह फ्रस्ट्रेशन का बहाना बताकर कुछ लोग सामने वाले को गाली देते हैं और उस फ्रस्ट्रेशन का नशा फ़ौरन उतर जाता है जब उसका परिणाम उसके उलट हो जाता है जैसे इंस्पेक्टर विनोद यादव का फ्रस्ट्रेशन कुछ ही घंटों में उतर गया और अब वो गिड़गिड़ा रहे हैं। सर्व समाज की यही चाहत है कि योगी सरकार ऐसे गैर जिम्मेदार इंस्पेक्टर को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर देना चाहिए और देखना चाहिए कि जब ये अपने परिवार में पहुँचता है तो क्या वहाँ भी अपना आपा खोकर अपनी माँ और बहन को गाली देता है ? शायद वो फिर अपना आपा नहीं खोएगा और अपनी माँ और बहन को गाली नहीं देगा…!!! ”

राजकुमार शुक्ला (गोरखपुर )


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