हिंदू एवं सिख समुदाय का महत्वपूर्ण त्यौहार – बैसाखी

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जयति भटाचार्य ।

बैसाखी को वैसाखी भी कहा जाता है। उत्तर भारत के हिंदू और सिक्खों का यह फसलों का त्यौहार बैसाखी सौर नव वर्ष का भी प्रतीक है अर्थात इस दिन सौर नव वर्ष प्रारंभ होता है। यह त्यौहार प्रत्येक साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। यह वैशाख मास का पहला दिन है। अत्यंत उत्साह के साथ इस त्यौहार को पंजाब, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा इत्यादि राज्यों में मनाया जाता है। भारत के अलावा पाकिस्तान, नेपाल, ब्रिटेन, अमरीका एवं मलेशिया के हिंदू और सिक्ख इस त्यौहार को धूमधाम से मनाते हैं।
इस वर्ष 2022 में बैसाखी 14 अप्रैल को मनाई जा रही है। सिक्खों के लिए इस त्यौहार का केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि ऐहितहासिक महत्व भी है। हिंदू मानते हैं कि वैसाखी के दिन गंगा नदी स्वर्ग से धरती पर आई थी इसलिए वैसाखी के दिन गंगा नदी में स्नान करना बहुत पवित्र माना जाता है।
इस दिन सिख समुदाय का नया साल प्रारंभ होता है। गुरू गोविंद सिंह ने बैसाखी के दिन खालसा की स्थापना की थी अर्थात यह खालसा का स्थापना दिवस है। खालसा पांच लड़ाकों का एक दल था जो कभी भी सिख धर्म के लिए अपना सर कटाने को तैयार थे।
इसके अलावा बैसाखी के दिन 1801 में रंजीत सिंह सिख साम्राज्य के राजा घोषित हुए। बैसाखी के दिन ही जनरल डायर ने जालियांवाला बाग में त्यौहार मनाने के लिए एकत्रित बेगुनाह एवं निहत्थे भारतीयों पर गोलियां चलवाई थीं। बैसाखी का पर्व धीरे धीरे अपनी तिथि बदल रहा है। 1801 में यह 11 अप्रैल को पड़ती थी। 2999 को बैसाखी 29 अप्रैल को पड़ेगी।
हिंदू और सिख दोनों के लिए यह फसलों का त्यौहार है। हिंदू इस दिन गंगा, झेलम, कावेरी इत्यादि नदियों में स्नान करते हैं। इसके बाद लोग मंदिरों में जाते हैं। घरों में स्वादिष्ट व्यंजन बनता है और लोग अपने रिश्तेदारों एवं दोस्तों से मिलने जाते हैं। बैसाखी के दिन हिंदू गरीबों एवं जरूरतमंदों  को हाथ से झेलने वाला पंखा, सुराही और मौसमी फल दान में देते हैं। अनेक हिंदू तीर्थ स्थलों पर मेला भी लगता है।
बैसाखी के दिन सिख समुदाय के लोग गुरूद्वारा जाते हैं। वहां पाठ और कीर्तन होता है। गुरूद्वारा से जुलूस निकलता है जिसमें सिख समुदाय के लोग भारी संख्या में भाग लेते हैं। अंत में लंगर से बैसाखी का समापन होता है।


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