कोरोना का सबक कुदरत की कद्र करना सीखो

देवदत्त दुबे ।
हम प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। यदि वास्तव में हमने इसके उद्देश्य को आत्मसात किया होता तो आज यह दुर्दशा नहीं होती। क्रूर कोरोना काल में सबसे ज्यादा मौतें ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई है और यही ऑक्सीजन हमें प्रकृति से निरंतर निशुल्क मिल रही है।

यह आने वाली पीढ़ी यो को भी मिलती रहे इसके लिए आज से ही पर्यावरण को बचाने के लिए सभी को संकल्पित होना जरूरी है।
दरअसल जीवन के लिए हवा और पानी का होना बहुत जरूरी है जो कि हमें प्रकृति ने निशुल्क और निरंतर उपलब्ध कराया है ।लेकिन हमने प्रकृति का इतना अंधाधुंध दोहन किया है की पीने का पानी हम बोतलों में खरीदने लगे हैं और यदि यही हाल रहा तो फिर पानी की बोतल के साथ साथ ऑक्सीजन का सिलेंडर भी साथ में रखना पड़ेगा। सोचो हम जिस प्रकृति के आवरण में सराबोर हैं सुरक्षित है हम उसी को नष्ट कर रहे हैं और अपने आप को विकासवादी और आधुनिक बता रहे है । कोरोना काल ने हमें सबक सिखा दिया है कि ना तो विकास के नाम पर पेड़ों को काटकर नदियों को रोक कर हुए निर्माण कार्य ही काम आए और ना ही हमारी आधुनिक प्रवृत्ति। यदि काम आए तो फिर खुली हवा और सूर्य से मिलने वाली धूप और प्राचीन काल से रसोई घर में उपलब्ध विभिन्न मसाले और ऋषि मुनियों द्वारा योग प्राणायाम का दिखाया गया मार्ग ।सो अब भी समय है हम कोरोना कॉल से सबक लें और पर्यावरण को बचाने का अभियान चलाएं यह अभियान केवल कागजों पर सोशल मीडिया पर फारवर्ड होकर ना रह जाए बल्कि इसके लिए वैसे ही प्रयास हो जैसे आप अपने बच्चों के लिए करते हैं।
जन्म लेने से लेकर उनकी देखरेख पालन पोषण शिक्षा दीक्षा करते हैं।

बहरहाल पिछले डेढ़ वर्ष से भी अधिक समय हो गया है जब हम सब कोरोना महामारी से हलाकान है और कुछ लोगों के जीवन में इतना कुछ घटित हो गया है कि वे वर्षों तक उससे उबर नहीं पाएंगे और समाज उन लोगों को भी नहीं भूल पाएगा। जिन्होंने इस आपदा में लोगों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी और कुछ लोगों ने अपना जीवन भी दांव पर लगाकर लोगों की सेवा की। इन खट्टे मीठे अनुभवों को अलग अलग महसूस किया होगा लेकिन सबसे बड़ा जो अनुभव है वह यही है कि अब प्रकृति के साथ कदमताल करते हुए चलना होगा। अन्यथा आगे और भी भयावह परिस्थितियां बन सकती हैं और तब शायद हमें सुधरने का मौका ही ना मिले। हमने इस कोरोना काल में क्या क्या नहीं देखा और क्या-क्या नहीं भोगा जिसको यदि लिखेंगे तो शायद समय भी कम पड़ जाए। कैसे हमने गंगा में बहती हुई लाशों को देखा है जिस गंगा को हम् मां मानते हैं जिसकी हम पूजा करते हैं उस गंगा मां को प्रदूषित करने में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी और कभी यह भी नहीं सोचा कि हम मां के साथ ये कैसा व्यवहार कर रहे हैं।

हाल ही में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सर्वे में बताया गया है कि प्रदेश की जीवनदायिनी मां नर्मदा पहले के मुकाबले में जल की गुणवत्ता सुधरी है मिठास बड़ी है। ऑक्सीजन का स्तर बढ़ा है क्योंकि लॉकडाउन के कारण कारखाने बंद रहे। नर्मदा तटों पर लोगों की आवाजाही कम होना बताया जा रहा है। जब दो माह में ही नर्मदा जल से बैक्टीरिया कम हो सकते हैं तो हम 365 दिन लगातार प्रयास करके अपने आसपास के जल को भी शुद्ध कर सकते हैं और हवा को भी वैसे हम भगवान गंगा, नर्मदा, वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, सब को बहुत मानते हैं लेकिन हम इनकी नहीं मानते अन्यथा विष्णु पुराण में बताया गया है कि 10 कुओं के बराबर एक बावड़ी और 10 बावरियों के बराबर एक तालाब और 10 तालाबों के बराबर 1 पुत्र और 10 पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है सोचो यदि हम विष्णु पुराण की मानते होते तो फिर क्यों वृक्ष काटते। यही नहीं वेद में यह भी बताया गया है सूर्य की किरणों से हृदय रोग पीलिया और हड्डियों के रोगों को दूर किया जा सकता है। लेकिन हम कमरा बंद एसी और कूलर में बैठना पसंद कर रहे। वैदिक काल में हमारी संस्कृति के देवता पृथ्वी सूर्य अग्नि वायु और वरुण हुआ करते थे और इन देवताओं की जब से हमने उपेक्षा की है तभी से मानव जीवन पर संकट बढ़ गए हैं। हमें पीपल वृक्ष का पूजन सिखाया गया था क्योंकि यह 24 घंटे ऑक्सीजन देता है। जिसकी कमी होती जा रही है कोरोना काल में ना जाने कितने लोगों को हमने ऑक्सीजन की कमी के कारण खोया है। कोरोना के साथ साथ ताऊ ते जैसे तूफान भी आए जो हमें स्पष्ट संदेश दे रहे हैं की अब कुदरत से छेड़छाड़ नहीं करो अन्यथा फिर पछताने का भी मौका नहीं मिलेगा।
कुल मिलाकर कोरोना महामारी से हम बहुत कुछ खो चुके हैं लेकिन सबक भी ले सकते हैं कि हमें विकास के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण प्रति भी संकल्पित होना है क्योंकि प्रकृति और जीवन की उपेक्षा कर अंधाधुंध विकास करने के प्रयास जब भी हुए हैं उसका खामियाजा पूरी मानव जाति को भोगना पड़ा है।
अतः आज हम सब विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति संकल्पित हो जिससे आने वाली पीढ़ियों को हम हवा और पानी बचा कर दे सके क्योंकि कोरोना महामारी‌ ने भी बता दिया है कि जब प्राकृतिक आपदा आती है तब पद पैसा प्रतिष्ठा नहीं बल्कि प्रकृति का संरक्षण और सानिध्य ही काम आता है और देर ना करें आ अब लौट चलें।