आपदा में निखरती भूलीबिसरी परम्पराएँ

करोना संक्रमण काल ने खानपान, रहनसहन की बहुतेरी आधुनिक कुव्यवस्थाओं को स्वतः ही उजागर करके रसातल में पहुंचा दिया है। जनमानस भी अपव्यय त्याग कर, अपने स्वास्थ्य, कर्म और भविष्य तथा संचय के प्रति ना सिर्फ जागरूक हो गया है, अपितु समझदारी से अपने परिवार, समाज, देश, दुनिया, पर्यावरण, पशु पक्षियों और पेड़पौधों की बेहतरी के लिए भी हरसम्भव प्रयास करता दिख रहा है। इसी तरह, करोना के बाक़ी विषयों से इतर, आज जागरूकता के उजाले की रौशनी में, रेडीमेड डब्बाबंद फ़ूड पदार्थ और ड्रिंक्स की उन सच्चाइयों को भी हम सबके सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं, जो इनके पैकेट्स पर सूक्ष्म अक्षरों और महीन लाइनों में कोडवर्ड्स में लिखी होती हैं। इन प्रोडक्ट्स के धन लोभी निर्माताओं द्वारा, कमजोर कानूनों की आड़ में की जा रही बेइमानियों और दी जा रही छद्म जानकारियों को ठीक से पढ़ने, समझने और जागरूक होने की भी, आज सबको बेहद जरुरत है। डिब्बा बंद, रेडी टू इट पैक्ड फूड्स का स्वाद बढ़ाने और उसे खराब होने से बचाये रखने के लिए, बहुत सारी नामी गिरामी कंपनियां, उसमे छद्म रूप से कई ऐसे इंग्रेडिएंट्स मिलाती हैं, जो ना सिर्फ स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होते हैं, बल्कि शाकाहारी पदार्थों में जानवरों की चर्बी और अन्य अवयवों के तत्व मिलकर लोगों की आस्था से भी खिलवाड़ भी करते हैं, इन तत्वों से मानव शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी हर ख़ासओआम को देने का, हमारा यह भागीरथी प्रयास इनके साम्राज्य की नींवें हिला सकता है और यह धनपिचास समूह और इनके टुकड़ों पर पलता तंत्र गलत रास्ते भी अपना सकता है। बाजारवाद और बेईमान धनउगाही व्यवस्था में, जनचेतना की इस लड़ाई को “एकला चालो रे” वाले अमिताभिया अंदाज में नहीं लड़ा सकता, इसलिए जरुरी है कि सभी लोग इस मुहिम में हमारे निर्भीक स्वतंत्र लेखक और हेल्थ एडिटर “डॉ भुवनेश्वर गर्ग” का हर सम्भव साथ देकर, सम्बल बढ़ाएं, तभी इस लड़ाई को जीत पाना और जनमानस की बेहतरी के लिए, कंपनियों को सच लिखने पर मजबूर करने और अनर्गल व्यापारिक कुकर्म करने से रोक पाना, संभव हो पायेगा! यह भी एक कटु सत्य ही है कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी, इस देश में, भ्रष्ट तंत्र के चलते, खुलेआम होती मिलावटों के बाजार में, मिलावटखोरों को सजा दिए जाने के इक्कादुक्का उदाहरण ही मिलेंगे, कानून भी बहुधा इन्ही के पक्ष में खड़ा होता और तारीखों पर तारीखें देता दिखता है, वहीँ दूसरी और, इंस्पेक्टरिया सिस्टम, अव्वल तो मिलावट की शिकायतों पर जांच होने ही नहीं देता या तीज त्योहारों पर खानापूर्ति करता दिखता है, और अगर कहीं आक्रोश या जनमानस के चौतरफा दबाव में जांच होती भी है, तो सालोंसाल रिपोर्ट नहीं आती है, और तब तक खाद्य अपमिश्रण अधिनियम (Prevention of Food Adultration Act, 1954) की दशकों पुरानी, असामायिक हो चुकी धाराओं के अंतर्गत बहुत सारा समय भी निकल जाता है, और थोड़े से जुर्माने के साथ ज्यादातर मिलावटी छूट जाते हैं। यूँ भी इस कानून में किसी भी व्यापारी या विक्रेता को दोषी पाये जाने पर मात्र 6 महीने का कारावास, जो कि तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, का प्रावधान है, और यह अपराध के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे जैसा ही है।इसलिए मिलावटी पदार्थों से बचने और अपमिश्रण की पहचान के लिए आज गृहिणियों का जागरूक होना ही समय की सबसे पहली आवश्यकता है। आज के युवाओं को, (आज की लड़कियों को भी), धनिये और मैथी का अंतर पता हो, यही बहुत बड़ी बात है। इसलिए अगर महिलायें जागरूक हो जाएँ, अपने बच्चों को भी करें और मिलावट की शिकायत करने के साथ साथ, सस्ते अमानक पदार्थ के लालच में ना पड़कर, मिलावटखोरों का सामूहिक बहिष्कार भी करने लगें, तो यक़ीनन इस अपराध की कमर चुटकियों में तोड़ी जा सकती है। कल इसके आगे, मेगी, पिज़्ज़ा और चिप्स में की जाने वाली मिलावटों पर विस्तार से (क्रमशः)हर वस्तु के पैक पर उसके निर्माण और उदगम स्थल का टंकण जरूरी हो जाए तो? चीनी और नक़ली वस्तुओं की पहचान, बहिष्कार आसान हो, खरीद पर ग्राहक का पूर्ण नियंत्रण हो सकेगा। सरकार इस दिशा में तुरंत कड़े कदम उठाये? “जय हिन्द” ।मिलते हैं कल, तब तक जय श्रीराम   ।

डॉ भुवनेश्वर गर्ग  drbgarg@gmail.comhttps://www.facebook.com/bhuvneshawar.garg डॉक्टर सर्जन, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, हेल्थ एडिटर, इन्नोवेटर, पर्यावरणविद, समाजसेवक मंगलम हैल्थ फाउण्डेशन भारतसंपर्क: 9425009303 

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