मिल्खा सिंह की जीवनी :कहानी जोश और हिम्मत की

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जयति भट्टाचार्य।  
मिल्खा सिंह जोश और हिम्मत के मसीहा हम सभी को 18 जून को छोड़ के अनन्तकाल की ओर चले गए। चंडीगढ़ में अपने इस जीवन काल की आखिरी सांस ली । 91 वर्षीय धावक मिल्खा सिंह को एक माह पहले कोरोना संक्रमित पाया गया । मिल्खा सिंह 20 मई को कोरोना पॉजिटिव पाए गए और उन्हें 24 मई को मोहाली के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया और 30 मई  को  डिस्चार्ज भी कर दिया  गया। 3 जून  को ऑक्सीजन लेवल कम होने पर उन्हें पीजीआईएमईआर के कोविड वार्ड में भर्ती किया गया। इस सप्ताह के प्रारम्भ में बृहस्पतिवार को उनका रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद उन्हें मेडिकल आईसीयू  में शिफ्ट किया  गया । पांच  दिन पहले  उनकी पत्नी निर्मल कौर कोरोना से जंग हार चुकी थी।

जन्म –

मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था । पाकिस्तान के रिकॉर्ड के अनुसार उनका जन्म 20  नवंबर 1929 को गोविंदपुरी , शहर मुजफ्फरगढ़ , पंजाब प्रान्त , ब्रिटिश भारत में  हुआ था। अन्य राज्यों के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी जन्म तिथि 17अक्टूबर 1935  अथवा 20  नवंबर  1935 है । उनका जन्म सिख राजपूत परिवार में हुआ था । कुलमिलाकर वह 15 भाई बहन थे जिनमे से 8 की देहांत बचपन में ही हो गई थी । उनका गांव सुदूर इलाके में पड़ता था ।

बंटवारा –

मिल्खा सिंह भारत पाकिस्तान बंटवारे के गवाह थे। बटवारे के समय वह किशोरावस्था से गुजर रहे थे । बंटवारे की आग ने उनके माता-पिता और कई भाई बहनों को लील लिया और यह सब उनकी आँखों के सामने  हुआ। म्ररने से पहले उनके पिता ने मिल्खा से कहा था भाग मिल्खा अपनी जिंदगी के लिए भाग। पंजाब में बंटवारे के समय हिन्दुओं और सिखों का कत्ले आम हुआ  था । मिल्खा सिंह 1947 में भाग कर दिल्ली आ गए थे। वहां अनेक दिनों तक वह पुराना क़िला में  रहें । दिल्ली में रहने वाली  उनकी एक विवाहित बहन ने मिल्खा को पुनर्वास में मदद की । अपनी आँखों के सामने पूरे परिवार को खोने का दर्द उनकी आँखों में हमेशा था। क्योंकि 15 साल की उम्र में  उन्होंने जो देखा वह भूलना बेहद  मुश्किल था हमेशा था। उन्होंने इंसान को हैवान बनते देखा । गांव में  सभी समुदाय के लोग बंटवारे से पहले मिलजुल कर रहते थे । मिल्खा एक मस्जिद में कई धर्मों के बच्चों के  साथ पढ़ते थे। उन्होंने पांचवी तक पढ़ाई की है । कॉलेज कभी नहीं गए या मौका ही नहीं मिला । मिल्खा का किशोरावस्था तो बंटवारे की भेंट चढ़ गया । एक दिन क्रोधित भीड़ गांव के बाहर जमा हो गई । एक स्थानीय नेता ने भीड़ से बात करने की कोशिश  की लेकिन वह मारे गए । मिल्खा का परिवार एक दूसरे  को बचाने की कोशिश कर रहा था । दूसरे दिन सुबह होने से पहले ही गांव में आक्रोशित भीड़ प्रवेश कर गई । भारी गोलीबारी के बीच अनेक लोग मौत की नींद सो गये । मिल्खा छुपने की कोशिश कर रहे थे। मिल्खा ने कहा था की उन्होंने अपने पिता को बहादुरी  के साथ लड़ते देखा था । उन पर तलवार से वार किया गया और वह गिर पड़े । गिरने के बाद उनके पिता ने मिल्खा से कहा था भाग मिल्खा भाग । वह गांव से भागकर पास के जंगल में छुप गए। रात वहां बिताने के बाद अगले दिन तड़के उन्होंने दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी । सह यात्रियों की मदद से वह महिला कम्पार्टमेंट में छुपकर दिल्ली पहुंचे। पुरानी दिल्ली स्टेशन के प्लेटफार्म पर हजारों रिफ्यूजी रह रहे थे । मिल्खा भी वहीँ रहने लगे, इसी बीच अफवाह फैली कि वहां हैजा फैल गया है। मिल्खा करीब तीन हफ्ते तक वहीँ रहे। वह यही सोच रहे थे कि उन्होंने अपना पूरा परिवार खो दिया  परन्तु स्टेशन पर खोया पाया  घोषणा के माध्यम से उन्हें मालूम हुआ कि उनकी एक बहन जीवित है। वह अपनी बहन से मिले और पुराना क़िला के रिफ्यूजी कैंप में चले गये।
वक्त ने उन्हें उम्र से बड़ा बना दिया था । वह छोटी मोटी नौकरी ढूंढ़ने लगे और प्रति माह दस रूपए के वेतन पर एक दुकान में काम करने लगे । उन्होंने एक बार फिर से पढ़ने कि कोशिश कि और नौवीं में अपना नाम लिखवाया परन्तु पढ़ाई जारी न रख सके। मिल्खा के लिए जीवन आसान न था । एक बार ट्रेन में बिना टिकट यात्रा  करते हुए पकडे गये । उनके बेल के लिए  बहन को अपने जेवर बेचने पड़े । ( उनकी  उम्र के  बारे में  सही  से नहीं बताया  जा सकता । अपनी  ऑटो  बायोग्राफी  में  बंटवारे  के  समय   अपनी   उम्र  14 /  15 बताई है।)

करियर-

उनका मन टूट चुका था । उन्होंने डाकू बनने कि ठान ली। किसी ने सलाह दी कि डाकू बनने कि जगह भारतीय सेना में शामिल हो जायें । तीन बार अस्वीकृति का सामना करने के बाद चौथे प्रयास में वह सेना में शामिल हो गये । 1951 में उनकी तैनाती सिकंदराबाद में इलेक्ट्रिकल मैकेनिकल इंजीनियरिंग सेंटर में हुई । यहीं पर उनके जीवन में नया मोड़ आया । उनका परिचय एथलेटिक्स से हुआ । दौड़ने का अभ्यास उन्हें पहले से ही था । गांव में पढ़ने के लिए वह दस किलोमीटर दौड़ कर जाते थे। नए रंगरूटों कि भर्ती  के लिए नियमित क्रॉस कंट्री दौड़ में उन्होंने छठा  स्थान हासिल किया। बचपन में दस किलोमीटर दौड़ने कि आदत काम आई । सेना में एथलेटिक्स के  विशेष अभ्यास के लिए उनका चयन हुआ।

मिल्खा सिंह को जब अपनी क्षमता का  एहसास हुआ तो उन्होंने निश्चय किया कि जितना हो सके अच्छा करेंगे । उन्होंने अभ्यास प्रारम्भ किया । कभी पहाड़ों पर , कभी नदी तट के बालुओं पर तो कभी मीटर गेज ट्रेन के साथ। रोजाना पांच घंटे के कड़े अभ्यास के बाद तो वह कभी कभी बीमार पड़ जाते ।  

1956 मेलबोर्न ओलिंपिक गेम्स में 200 एवं 400 मीटर दौड़ के लिए उनका चयन हुआ। प्रारंभिक चरण के बाद वह आगे नहीं बढ़ पाए क्यूंकि उस समय वह बहुत ही अनुभवहीन थे। 400मी के चैंपियन चार्ल्स जेंकिन्स से उनकी जान पहचान काम आई। जेंकिन्स ने मिल्खा को प्रशिक्षण का सही तरीका बताया और अगली बार बेहतर करने के लिए प्रेरणा दी।

1958 में भारत के कटक शहर में राष्ट्रीय  खेलों का आयोजन हुआ । इसमें मिल्खा ने 200 मी.  और 400 मी.  में भाग लिया और राष्ट्रीय  रिकॉर्ड बनाये। इसी  वर्ष  कार्डिफ में हुए कॉमन  वेल्थ गेम्स में 400 मी. दौड़ प्रत्योगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। भारत में  वह पहले पुरुष प्रतियोगी बने जिसने कॉमन वेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स के व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण जीता था। उन्होंने 1958 में टोक्यो ओलंपिक्स में पाकिस्तानी धावक अब्दुल ख़ालिक़ को हराकर स्वर्ण पदक जीता।

श्रीमती निर्मल मिल्खा सिंह की एक्सक्लूसिव इंटरव्यू : http://merimanorama.in/interview/charcha-mae-hae-jinke-piya-manorama-column-interview-of-nirmal-kaur-wife-of-milkha-singh/

 इससे प्रेरित होकर 1960  में पाकिस्तान से एक दौड़ के लिए मिल्खा सिंह को आमंत्रण मिला। उन्होंने  वहां न जाने का निर्णय लिया क्योंकि बंटवारे की दर्दनाक यादें अभी भी मिल्खा के जेहन में ताज़ा`थीं। तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मिल्खा सिंह को अपने दुःख से ऊपर उठकर पाकिस्तान जाने के लिए  कहा। वह पाकिस्तान गए और स्टेडियम में 7000 से अधिक लोगों की भीड़ के सामने एक बहुत ही रोमांचक प्रतियोगिता में एक बार फिर से अब्दुल ख़ालिक़ को  हरा दिया ( उस  वक्त 7000  लोगों की भीड़ बहुत होती थी )। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान इस प्रत्योगिता के साक्षी थे। उन्होंने मिल्खा सिंह के बारे में कहा – वह दौड़ते नही  उड़ते हैं । इस तरह उन्हें फ्लाइंग सिख का उपनाम मिला। इस दौरे पर वह अपने गांव गए थे और अपने बचपन के साथियों से मुलाकात की जो बहुत उत्तेजनापूर्ण थे ।

1960 के ओलंपिक्स में वह  सबके प्रिय थे , परन्तु 400  मी के फाइनल में उन्होंने चौथा स्थान हासिल किया। फाइनल जीता अमेरिका के ओटिस डेविस  ने। हार का गम उन्हें मृत्युपर्यन्त सालती रही।

1962 में जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में 400   मी एवं 4 गुणा 400 मी. रिले में स्वर्ण पदक जीता ।
करियर के अंतिम दौर में वह पंजाब मिनिस्ट्री ऑफ़ एजुकेशन में डायरेक्टर ऑफ़ स्पोर्ट्स बनें और 1998  में अवकाशप्राप्त किया । अपने करियर में उन्होंने 80 अंतर्राष्ट्रीय दौड़ में भाग लिया जिसमें से 77 में जीत का सेहरा उनके सर बंधा । ऐसा कहा जाता है परंतु इसका कोई प्रमाण नहीं है कि उन्होंने कितने दौड़ में हिस्सा लिया और कितने में जीते।

अवार्ड-

  • 1959 में मिल्खा सिंह को अपने शानदार प्रदर्शन के लिए भारत का चौथा  सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पदम् श्री से नवाज़ा गया ।
  • 2001 में भारतीय सरकार के उनको अर्जुन अवार्ड देने के फैसले  पर  आप्पत्ति जताते हुए अवार्ड लेने से इंकार कर दिया । उन्होंने कहा “यह खेलों  में सक्रिय खिलाडियों को दिया जाता है” । “मुझे उन खिलाड़ियों के साथ खड़ा कर दिया गया जो मेरे द्वारा हासिल किये गए सफलता को छू भी नहीं सकते “। “आजकल अवार्ड की कीमत कम हो गयी है” । 2014 में गोवा के एक कॉलेज में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा था “आजकल अवार्ड मंदिर के प्रसाद की तरह बंटते हैं” ।
  • 1958 के एशियन गेम्स के 200 मी. दौड़ में स्वर्ण जीता।
  • 1958 के एशियन गेम्स के 400 मी. दौड़  में स्वर्ण जीता।
  • 1958 के कॉमन वेल्थ गेम्स में 440 यार्ड्स  का  स्वर्ण  पदक जीता।
  • 1962 के एशियन गेम्स में 400 मी. में स्वर्ण जीता।
  • 1962 के एशियन गेम्स में 4 गुणा 400 मी. रिले का स्वर्ण जीता।
  • 1958 कटक राष्ट्रीय खेलों  में 200 मी.  और 400 मी. का स्वर्ण जीता ।
  • 1964 कलकत्ता राष्ट्रीय खेलों में 400 मी. का रजत पदक जीता ।
  • ओलिंपिक एवं अन्य पदकों के बारे में उनके करियर में मिलेगा ।

परवर्ती जीवन-

वह चंडीगढ़ के सेक्टर 8 में अवकाशप्राप्ति के बाद बस गए थे, अब उनके जीवन में परिवार, नाती-पोते और गोल्फ था । उन्हें सुखना झील के आस पास जॉगिंग  करते देखा जाता था जो कि उनके घर के पास स्थित है। पुत्र जीव मिल्खा सिंह जिन्होंने गोल्फ में नाम कमाया, गोल्फ टूर्नामेंटों में उनका खेल देखते हुए अक्सर देखा जा सकता था। वह जितने जूनून के  साथ एथलेटिक्स कि बात करते थे उसी तरह गोल्फ कि भी बात करते । उनके जीवन और घर का केंद्र थीं पत्नी निर्मल कौर।

विवाह और प्रेम  

मिल्खा सिंह सीलोन में भारतीय महिला वॉलीबॉल  टीम की पूर्व कप्तान निर्मल सैनी से 1955 में  मिले। news18 .com से उपलब्ध मिल्खा सिंह की प्रेम कहानी: उसके बाद अप्रत्याशित रूप से 1960 वह   निम्मी से पुनः मिले। उस  वक्त वह दिल्ली के लेडी इरविन कॉलेज में डिप्टी फिजिकल एजुकेशन  इंस्ट्रक्टर के  रूप में कार्यरत थी। एक दिन जब मिल्खा स्टेडियम में प्रैक्टिस कर रहे थे , तो उन्हें एक  वॉलीबॉल मैच  देखने के लिए निमंत्रित किया गया। वहां जाकर वह अपनी सीट पर बैठ गए। मैच खत्म होने के तुरंत बाद एक तरुणी उनके  पास आई और हाथ जोड़कर बोली सत श्री अकाल ।

वह  तुरंत निम्मी को पहचान गए । परन्तु इतना बदलाव, सलवार कुरता दुपट्टा मेँ लम्बे बालों की चोटी बनाये वह छात्रा और आज साड़ी पहने जूड़ा बनाये , आत्मविश्वास से भरी एक प्रोफेशनल  तरुणी । प्रत्योगिता के बाद वह उनके पास आई और ज़बरदस्ती अपने साथ चाय के लिए अपने हॉस्टल ले गयी जो स्टेडियम के पास ही था । जाते-जाते और भी सबल रूप में  उनकी पुरानी भावनायें लौट आईं। अचानक निम्मी ने उनसे कहा “आप एक चिंता मुक्त पंछी की तरह पेड़ों पर विचरण करते रहते हैं , जबकि मैं एक उदास वृक्ष की तरह हूँ  जिस पर आप कुछ देर के लिए बैठे फिर उड़ गए । क्या कभी भी क्षण भर के लिए सोचा कि यह उदास वृक्ष कितनी अकेली  है। उन्होंने कहा निम्मी तुम्हारे सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं है।

उसी  दिन  से  उनका  रिश्ता  बदल गया और वह   अक्सर मिलने लगे। यह वही दौर था जब मिल्खा  सिंह की प्रोफेशनल लाइफ का एक नया अध्याय  प्रारम्भ होने जा रहा था । उन्होंने सेना से त्यागपत्र दे दिया था और 1950 में नव निर्मित चंडीगढ़ शहर में रहने लगे थे। वह अपने दोस्तों और कलिग्स के बिना उदास , अकेले  थे। उनकी कमी के साथ ही , निम्मी की कमी को और अधिक महसूस करने लगे । वह प्रत्येक सप्ताहांत पर निम्मी के साथ वक्त बिताने दिल्ली जाते थे।
एक  शाम निम्मी को हॉस्टल से लेकर वह  ड्राइव के लिए अपनी फ़िएट कार से मथुरा रोड की ओर गए । वह लोग बातों में इतने मशगूल थे कि पता ही नहीं चला कब कार ने फुटपाथ पर टक्कर मारी और  मजदूरों के एक दल की ओर बढ़ गया। हादसे में एक महिला मजदूर घायल हो गयी । आक्रोशित भीड़ ने  मिल्खा सिंह की कार के शीशे तोड़ दिए । निम्मी यह  सब देखकर डर गयी । कुछ लोग मिल्खा को पहचान गए । मिल्खा ने उन्हें निम्मी को कॉलेज पहुँचाने का आग्रह किया । इसके बाद उन्होंने घायल महिला का इलाज करवाया और एक महीने की तनख्वाह उसके पति को दी। वह निम्मी से मिलते रहे ।
कुछ दिनों बाद निम्मी को पंजाब के क्रीड़ा विभाग में   जहाँ मिल्खा डिप्टी डायरेक्टर थे असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी मिल गई । अब वह आसानी से मिल सकते  थे , परन्तु चंडीगढ़ दिल्ली जैसा बड़ा शहर नहीं था। उनकी मुलाकातें लोगों की नज़रों में खटकने लगी।  

लोग तरह तरह की बातें करने लगे और उनके रिश्ते की बात मुख्यमंत्री तक पहुँच गयी । वह बहुत नाराज़  हुए। दिल्ली में निम्मी के परिवार को  इस बात की भनक लग चुकी थी । निम्मी का परिवार समृद्ध था । वहां से कैरों साहब के पास चिट्टी आई जिसमें लिखा था  वह उनकी बेटी के साथ गलत व्यव्हार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के यहाँ से मिल्खा को बुलाया गया।  

मिल्खा सिंह ने कहा कि यह एक दोस्ती के अलावा कुछ नहीं। कभी कॉफ़ी कभी थोड़ी सी बात चीत । अगर परिवारवालों को मुझ पर भरोसा न हो तो अपनी बेटी से पूछें ।

मुख्य मंत्री ने कहा “तुम दोनों का रिश्ता सार्वजानिक चर्चा का विषय बन गया है”।  
मिल्खा सिंह ने नरमी के साथ कहा कि अगर मुख्य मंत्री नाराज़ हैं तो वह त्यागपत्र देकर चंडीगढ़ छोड़ देंगे । परन्तु मुख्य मंत्री को उनकी बात सुननी पड़ेगी। उन्होंने कह दिया कि वह निम्मी से प्यार करते हैं और विवाह करना चाहते  हैं । मुख्य मंत्री ने कहा यदि वह विवाह करते हैं तो ठीक है वर्ना मुलाकातें बंद करनी पड़ेंगी।

मिल्खा सिंह विवाह के लिए मुख्य मंत्री की स्वीकृति पाकर बेहद खुश हुए। परन्तु उन्होंने जो न सोचा था वही हुआ । 1962 में सामाजिक प्रथाओं को तोड़ना बहुत मुश्किल था । दोनों  के परिवारवाले सिख और  हिन्दू की शादी के लिए  तैयार न थे। अंत में  सबको मानना पड़ा और दोनों ने एक सफल विवाहित जीवन बिताया ।

उनके चार संतान हुए । तीन पुत्री और एक पुत्र जीव मिल्खा सिंह जिन्होंने  गोल्फ में नाम कमाया । कारगिल युद्ध में मारे गए  हवलदार बिक्रम सिंह  के  सात  वर्षीय  पुत्र  को 1999  में गोद लिया  था ।

मिल्खा सिंह और मीडिया लोकप्रिय संस्कृति
मिल्खा सिंह की ऑटोबायोग्राफी द रेस ऑफ़ माई लाइफ 2013 में प्रकाशित हुई । इसे मिल्खा सिंह एवं उनकी पुत्री सोनिया सांवल्का ने मिलकर लिखा । इसी  किताब से प्रेरित होकर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने मिल्खा सिंह की जीवनी पर भाग मिल्खा भाग के  नाम से फिल्म बनाई । लीड रोले में थे फरहान अख्तर और केंद्रीय भूमिका में थीं दिव्या दत्ता एवं सोनम  कपूर । इस फिल्म को भारत में व्यापक सफलता मिली। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में इसने कई पुरस्कार जीते जिसमें बेस्ट पॉपुलर फिल्म प्रोवाइडिंग  होलसम एंटरटेनमेंट भी शामिल था । 2014 में इस फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय भारतीय अकादमी पुरस्कार में पांच पुरस्कार जीते । इस फिल्म से 100 करोड़ की कमाई हुई थी । मिल्खा सिंह ने मूवी के अधिकार एक रूपए में बेच दिए परन्तु एक शर्त रखी कि मुनाफे का एक भाग मिल्खा सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट को दिया जाये। इस ट्रस्ट का गठन 2008 में  गरीब एवं  जरूरतमंद खिलाड़ियों कि मदद के लिए किया गया था ।
“मदाम तुसाद” के शिल्पकारों ने लंदन में मिल्खा  सिंह का मोम का पुतला बनाया जिसका अनावरण 2017 में चंडीगढ़ में हुआ। इसमें मिल्खा सिंह को 1958 के कॉमनवेल्थ गेम्स में विजयी दौड़ की मुद्रा  में दर्शाया गया है । यह पुतला नई दिल्ली में मदाम टुसॉड्स म्यूजियम में रखा गया है।

जानें कहाँ हैं मिल्खा सिंह के पदक
एक खिलाड़ी के लिए उसके पदक जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। मिल्खा ने अपने सभी पदक देश को  दान कर दिया। पहले उन्हें प्रदर्शित करने के लिए नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में रखा  गया, बाद में उन्हें पटियाला के स्पोर्ट्स
संग्रहालय में भेज दिया गया ।
मिल्खा सिंह ने 2012 में राहुल बोस द्वारा आयोजित एक चैरिटी नीलामी में अपने एडिडास जूतों की जोड़ी  को दान में दे दिया जिन्हें उन्होंने 1960 में 400  मी के फाइनल  में पहना  था ।

मिल्खा सिंह और  विवाद  
मिल्खा सिंह ने 2016 के रिओ ओलंपिक्स में बॉलीवुड  अभिनेता को गुडविल एम्बसेडर बनाये जाने पर  आईओए के  निर्णय पर नाराजगी जताई थी। आईओए ने रिओ ओलंपिक्स के लिए सलमान खान  को गुडविल एम्बसेडर बनाया था और मिल्खा सिंह का कहना था कि वह सलमान के  खिलाफ नहीं हैं परन्तु उनका कहना है कि यह सम्मान खेल जगत के किसी हस्ती को मिलना चाहिए। सलमान खान के पक्ष  में  उनके  फैंस, बॉलीवुड सितारे यहाँ तक कि ऐश्वर्या  राय बच्चन भी खड़ी हो गयीं लेकिन मिल्खा सिंह  अपनी  बात  पर डटे  रहे । सलमान खान के पिता सलीम खान ने मिल्खा सिंह पर ट्वीट की बरसात कर दी । उन्होंने कहा की सलमान खान भी एक अच्छे एथलीट थे , सलीम खान ने यह भी कहा कि बॉलीवुड ने ही मिल्खा सिंह को पुनर्जीवित कर भूलने नहीं दिया । मिल्खा  सिंह ने  कहा  की “मैंने  सही कहा है , एम्बैसेडर उसे ही बनना चाहिए जिसने राष्ट्र के लिए  खून पसीना बहाया हो”। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्वतंत्र  दुनिया है । मैं जो चाहता हूँ कह सकता हूँ और  अगर सलीमजी मुझे कुछ कहते हैं तो मैं बुरा नहीं मानूंगा । इसके अलावा अर्जुन अवार्ड को लेकर भी विवाद हुआ था जो ऊपर दिया गया है ।
कुल मिलाकर मिल्खा सिंह का जीवन सबके  लिये प्रेरणादायी  है । बंटवारे के दंश को झेलने के बाद अपने जीवन को इतना सफल बनाना बहुत बड़ी बात है और हर  किसी के  लिए मिसाल ।
अमूल ने मिल्खा सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट  किया है मिल्खा सिंह ने अपने जीवन का इतिहास कलम से नहीं पैरों से लिखा है ।


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