कौन थे मदन लाल धींगरा

अमर शहीद मदन लाल ढींगरा के शब्द थे," धन और बुद्धि से हीन मेरे पास सिर्फ मेरा रक्त और जीवन है। उसे मैं भारतमाता की पवित्र बेदी पर समर्पित कर रहा हूँ। मौजूदा समय में केवल और केवल देश के लिए मरना सीखना है और खुद मरकर दूसरों को मरना सिखाना है। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है। फिर उसी माँ की कोख से जन्म लूं। फिर उसी महान उद्देश्य के लिए जान दूँ। तब तक, जब तक देश आजाद न हो जाये।
           सिविल सर्जन पिता के अंग्रेज भक्त सुविधा सम्पन्न परिवार में 18 फरवरी 1883 को अमृतसर में जन्मे मदन लाल ढींगरा ने बचपन से ही परिवार के विपरीत राह पकड़ ली। ये राह त्याग - समर्पण की थी। विदेशी सत्ता से जूझने की । खतरे ही खतरे। जिसमे सिर्फ़ खोना ही खोना था। खुद का जीवन भी। मदन लाल ढींगरा जैसे सपूत  बड़े मकसद के लिए पैदा हुए । उसी के लिए थोड़ी सी जिन्दगी जिये और फिर बड़ा काम कर युगों तक दोहराई जाने वाली गौरव गाथा छोड़ अमर हो गए। 1904 में लाहौर के गवर्नमेन्ट कालेज में छात्रों के लिए विदेशी कपड़े के ब्लेजर की अनिवार्यता की गई। मदन लाल ने विरोध में छात्रों के जुलूस की अगुवाई की। कालेज से निष्कासित कर दिए गए। फिर देश की जनता की गरीबी और अकाल के कारणों के गहन अध्ययन में जुट गए। इसी के साथ राष्ट्रवादी आंदोलन के नजदीक होते चले गए।आंदोलन से जुड़ाव उन्हें अंग्रेज समर्थक अपने परिवार से दूर करता गया। बहुत जल्द ही पिता डॉक्टर गीता मल्ल ने पुत्र मदन लाल से कोई वास्ता न होने की अखबारों में नोटिस छपवा दी। कुछ छोटी-मोटी नौकरियां की। एक फैक्ट्री में भी। लेकिन  यूनियन गठन की कोशिशों के चलते वहां से छुट्टी हो गई। बड़े भाई डॉक्टर बिहारी लाल की सलाह पर 1906 में वह लन्दन पहुंचे। । मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। 
        लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा राष्ट्रवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने में लगे हुए थे। 1905 में उन्होंने 65, क्रामवेल एवेन्यू, लन्दन में एक मकान खरीदा और उसमें भारतीय छात्रों के लिए हॉस्टल शुरु किया। बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार  केसरी' में श्यामजी कृष्ण वर्मा पर एक लेख लिखा। उसमे इंडिया हाउस हॉस्टल की भी चर्चा थी। विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर ) ने यह लेख पढ़ा। श्यामजी द्वारा प्रकाशित  पत्रिका ' इंडियन सोशियोलॉजिस्ट' के कुछ अंक भी उनकी निगाह से गुजरे। पत्रिका में श्यामजी द्वारा भारतीय छात्रों को दिए जाने वाले वजीफ़े की भी जानकारी दी गई थी। 1906 में सावरकर ने आवेदन किया। तिलक ने उनकी सिफारिश करते हुए लिखा कि सावरकर नौकरी के लिए पढ़ाई नही कर रहे है। जाहिर तौर पर कानून की पढ़ाई के लिए सावरकर 15 जून 1906 को लन्दन पहुंचे।  उद्देश्य कुछ और था। देश के विभिन्न हिस्सों से वहां पहुंचे भारतीय छात्रों से वह जुड़ना चाहते थे। उस समय वहां भारत के 700 छात्र थे, जिसमे 380 लन्दन में थे।  अंग्रेजों की कमजोरियों को समझना और साथ ही रुस, चीन, आयरलैंड,तुर्की, इजिप्ट और ईरान के क्रन्तिकारियों की कोशिशों से भी वह परिचित होना चाहते थे। तमाम ठिकानों से हथियार हासिल करके भारत में चल रही क्रांतिकारी गतिविधियों को गति और ताकत देने का भी इरादा था। सावरकर ने लन्दन के इंडिया हाउस में इतवार को साप्ताहिक बैठकों का सिलसिला शुरु किया। भारत के भविष्य से जुड़े विषयों पर सभी सोच के लोगों को इसमें सक्रिय हिस्सेदारी का अवसर था। जल्दी ही इन बैठकों में भारतीय छात्रों और अन्य प्रमुख भारतीयों की दिलचस्पी बढ़ती गई। अगले चार वर्षों तक ये हॉस्टल खबरों के केंद्र में रहा। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने उसकी टोह लेनी शुरु कर दी। बैठकों में शामिल होने वालों में भाई परमानंद, लाला हरदयाल ( गदर पार्टी), वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय (सरोजनी नायडू के भाई),सेनापति बापट, हेम चंद्र दास, एमपीटी आचार्य,वी वी एस अय्यर,ज्ञान चंद्र वर्मा (सचिव अभिनव भारत), दादा भाई नौरोजी, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, मादाम कामा, सरदार सिंह राना, दादा साहब कर्णीडकर, रवि शंकर शुक्ल,सैयद हैदर रजा, आसफ़ अली, शपरुजी सकलतवाला आदि के नाम शामिल थे। संयोग से बैरिस्टर मोहन दास करम चंद गांधी से सावरकर की पहली मुलाकात इंडिया हाउस में ही हुई। दूसरे देशों के क्रांतिकारी भी इन बैठकों में आते रहे। उनमें एक बड़ा नाम लेनिन का था।
            इतवार की एक बैठक में सावरकर भारत की आजादी पर एक गम्भीर भाषण दे रहे थे। बगल के कमरे में मदनलाल ढींगरा और उनके साथियों के शोर के कारण सावरकर को भाषण रोकना पड़ा। वह उस कमरे तक पहुंचे। ढींगरा को झिड़की देते हुए उन्होंने कहा," एक्शन और बहादुरी की बात करते हो और हमारी मीटिंग में भी नही आते। तुम्हारी यही बहादुरी है? लज्जित ढींगरा फिर कई दिन तक इंडिया हाउस नही आये। वह सावरकर की नाराजगी को लेकर फिक्रमंद थे। कई दिनों बाद जब उनका सावरकार से सामना हुआ तो नाराजगी का कोई चिन्ह नही था। पुराने अंदाज में सावरकर उनसे मिले। मदनलाल ने उनसे पूछा," क्या बलिदान का समय आ गया है? सावरकर का जबाब था," बलिदानी ने अगर खुद को बलिदान के लिए तैयार कर लिया है, तो माना जाता है कि बलिदान का समय आ गया है।"
           ढींगरा मन बना चुके थे। अंग्रेजी खुफिया एजेंसियों को झांसा देने के लिए उन्होंने इंडिया हाउस और सावरकर से दूरी बनाने का आडम्बर रचा। ईस्टर के बाद 1909 में इंडिया हाउस छोड़कर मिसेज़ हैरिस के लन्दन स्थित मकान 108 लेदबरी रोड में रहने आ गए। क्रन्तिकारियों के रास्ते जाने से रोकने में लगे जॉली क्लब और नेशनल इंडियन असोसिएशन की सदस्यता हासिल की। वहां सावरकर और अन्य क्रन्तिकारियों की भरपूर आलोचना करते हुए उन्हें गलत बताया। मुख्यतः एंग्लो इंडियन्स द्वारा संचालित इस संस्था के कार्यक्रमों में बड़ी अंग्रेज शख्सियतें भी शामिल होती थीं। ढींगरा जल्दी ही सेक्रेटरी मिस एमा जोसेहपिन बेक के भरोसे के लोगों में आ गए। उन्हें ब्रिटिश अतिथियों के कार्यक्रमों के ब्यौरे मिलने लगे। भारत में वाइसरॉय रह चुके लार्ड कर्जन की हत्या के ढींगरा के वहां दो प्रयास विफ़ल रहे। बंगाल के पूर्व गवर्नर ब्रेम्फील्ड फुलर भी समय की चूक से बच गए। ब्रिटिश खुफिया पुलिस के प्रमुख कर्नल सर विलियम हंट कर्जन वायली उन दिनों सावरकर और अन्य क्रन्तिकारियों को घेरने में जुटे हुए थे। कर्जन वायली भारतीय मामलों को देखने वाले सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के  राजनीतिक सचिव भी थे। सावरकर और इंडिया हाउस के जरिये जारी क्रांतिकारी गतिविधियों की पुख़्ता जानकारी के लिए कर्जन वायली ने कीर्तिकर नाम के एक व्यक्ति को अपना मुखबिर बनाया। कीर्तिकर ने खुद को छात्र बताकर इंडिया हाउस में जगह बनाने की कोशिश की। सावरकर और साथी जल्दी ही कीर्तिकर की असलियत जान गए। कीर्तिकर को धमका कर उल्टे ब्रिटिश खुफिया विभाग से जुड़ी जानकारियां उससे ली जाने लगीं।
          1 जुलाई 1909 को लन्दन के इम्पीरियल इंस्टीट्यूट के जहांगीर हाल में नेशनल इंडियन असोसिएशन की बैठक आयोजित थी। कर्जन वायली सहित तमाम ब्रिटिश शख्सियतें इसमे हिस्सा लेने वाली थीं। ढींगरा ने 29 जून को सावरकर से विपिन चंद्र पाल के घर पर मुलाकात की। निरंजन पाल ने वह बयान टाइप किया, जो कि हत्या के बाद ढींगरा को देना था। सावरकर ने उन्हें बेल्जियम मेक ब्राउनिंग पिस्टल देते हुए पूरी योजना फिर से समझाई। पूरा बयान याद करने पर जोर दिया। 30 जून को ढींगरा इंडिया हाउस सावरकर से मिलने आये, लेकिन मुलाकात नही हो सकी। पहली जुलाई को दोपहर ढींगरा "फ़नलैंड" पहुंचे। 18 फीट की दूरी से पिस्टल से दर्जन भर निशाने साधे। इसमें 11 अचूक थे। शाम को सात बजे नीली पंजाबी पगड़ी और सूट मे सजे ढींगरा ने इम्पीरियल इंस्टीट्यूट के लिए टैक्सी ली। उनकी अलग-अलग जेबों में पिस्टल थीं। भीतरी जेब में वह बयान जो एक्शन के बाद देना था। पिस्टल सहित उनके साथी कोरगावँकर भी वहां पहुंच गए। पूरी तैयारी करके चले ढींगरा सबसे महत्वपूर्ण चीज लाना भूल गए थे। वह चीज थी- प्रवेश पास। लेकिन सहयोगी सदस्य होने के कारण विज़िटर रजिस्टर में दस्तख़त करके वह प्रवेश हासिल करने में सफल हो गए। मीटिंग खत्म होने के बाद कर्जन वायली बाहर जाने को ही थे कि कोरगाँवकर ने ढींगरा को आगे बढ़ने को कहा। ढींगरा  अपने बड़े भाई कुंदन लाल ढींगरा के पत्र के जरिये कर्जन वायली से पूर्व में परिचित हो चुके थे। कर्जन की ओर मुख़ातिब ढींगरा ने यह अहसास कराने की कोशिश की, कि जैसे वह कोई गोपनीय बात करना चाहते हैं। कर्जन ने अपना कान उनके नजदीक किया। ढींगरा ने तुरंत उसे दो गोलियां मार दीं। मौत तयशुदा करने के लिए अगले ही पल ढींगरा की पिस्टल से दो और गोलियां कर्जन के शरीर में उतर चुकी थीं। समय रात का 11.20 था। कर्जन के बचाव में आगे आये एक पारसी डॉक्टर कावसजी लालकाका की भी ढींगरा की गोलियों से मौत हो गई। भीड़ की धक्का-मुक्की के बीच ढींगरा का चश्मा दूर गिर गया। उस उत्तेजक माहौल में भी बेफिक्र ढींगरा ने कहा," कृपया मेरा चश्मा दे दीजिए।" इसके बाद ढींगरा ने खुद को पुलिस को सौंप दिया। पुलिस ने पूछा कि क्या अपने किसी मित्र को खबर देना चाहोगे ? चतुर ढींगरा का जबाब था,"लोगों को कल अखबार से खबर मिल जाएगी।" मेडिकल परीक्षण करने वाला डॉक्टर चकित था कि दो हत्याएं करने और पुलिस हिरासत में होने के बाद भी धींगरा की नाड़ी गति बिल्कुल सामान्य थी।
         सुबह मशहूर अखबार "लन्दन टाइम्स" में कर्जन वायली की हत्या मुख्य ख़बर थी। अगले एक हफ़्ते तक सिर्फ लन्दन नही पूरे यूरोप के अखबार इस कांड के जरिये भारतीय क्रन्तिकारियों की अगली योजनाओं को टटोलते रहे। अखबारों ने 5 जुलाई 1909 को आगा खान की अध्यक्षता में हुई शोकसभा का ब्यौरा भी छापा। इस सभा में अधिकांश लोगों  ने कर्जन की हत्या के लिए मदन लाल ढींगरा की निंदा की। सभा में अशांति तब शुरु हुई जब आगा खान ने  ढींगरा के कृत्य की निन्दा के सर्वसम्मति प्रस्ताव की बात की। सावरकर ने जैसे ही विरोध में बोलने की कोशिश की, एक अंग्रेज एडवर्ड पामर ने उनके माथे पर घूंसा जड़ दिया। तुरंत ही उनके क्रांतिकारी साथी एमपीटी आचार्य ने अपनी पिस्टल पामर पर तान दी। सावरकर ही आचार्य को रोक पाए, अन्यथा पामर की जान जाना तय थी। 7 जुलाई को द टाइम्स ने सावरकर का वह पत्र छापा, जिसमे उन्होंने लिखा था कि अदालत के फैसले के पहले कोई मदन लाल ढींगरा की निंदा नही कर सकता। एक आयरिश राष्ट्रवादी द्वारा अमेरिका से निकाले जाने वाले अख़बार "गाएलिक अमेरिकन" ने भारत के स्वतंत्रता प्रयासों में दिलचस्पी दिखानी शुरु की। उसके कॉलमों में लन्दन में रहने वाले भारतीय क्रन्तिकारियों के लेखों को नियमित जगह मिलने लगी। अख़बार ने भारतीयों की तकलीफों और अंग्रेजों की ज्यादतियों के पर्दाफ़ाश किया। ब्रिटिश राज को भारत के राजे-महाराजाओं और अंग्रेज भक्तों के तमाम शोक संदेश और ढींगरा की निंदा के प्रस्ताव मिले। ये भारतीय अखबारों में छपे अथवा सीधे भेजे गए। पर ढींगरा की बहादुरी और देशभक्ति से जुड़ी खबरें और उनके पक्ष में बोलने-लिखने वाले कहीं ज्यादा थे।
          मुकदमे के लिए ढींगरा जेल से तीन बार वेस्टमिन्स्टर कोर्ट लाये गए। 2जुलाई,10 जुलाई और 23 जुलाई 1909 को। 2 जुलाई को स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस ने उन्हें एक हफ़्ते के लिए रिमांड पर लिया। ढींगरा के जेब से मिले बयान,चश्मदीदों और अन्य सबूतों के आधार पर पुलिस ने चार्जशीट पेश की। तफ्तीश के दौरान एक एंग्लोइंडियन वकील ने मदद की पेशकश की। ढींगरा ने मना कर दिया। विवेचक ने पूछा कि क्या किसी को सूचित करना चाहोगे? उत्तर नकारात्मक था। 10 जुलाई को मैजिस्ट्रेट होरेस स्मिथ ने आरोपों के बारे में उन्हें पक्ष रखने का मौका दिया। ढींगरा ने कहा," मुझे कहना है कि मैंने डॉक्टर कावसजी लालकाका की इरादतन हत्या नही की। मैं उन्हें नही जानता था। जब वह मुझे पकड़ने के लिए बढ़े, तब मैंने अपने बचाव में उन पर गोली चलाई। मैं कोई रहम नही चाहता। मुझ पर मुकदमा चलाने का आपको कोई अधिकार नही है। जर्मनी अगर इंग्लैण्ड पर शासन नही कर सकता तो फिर इंग्लैण्ड कैसे भारत पर शासन कर सकता है? " ढींगरा ने देशभक्ति से ओतप्रोत एक लम्बा बयान दिया। अदालत की कोशिश थी, कि उसका प्रचार न हो। अगले दिन मशहूर अख़बार " द टेलीग्राफ " की सुर्खी थी," इम्पीरियल इंस्टीट्यूट हत्याकांड ; ढींगरा का चौंकाने वाला बयान ; अंग्रेज को मारा जाना जायज़ ।" अखबार ने ढींगरा को उदधृत किया," मैं अपने बचाव में कुछ नही कहना चाहता। सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मैंने जो किया वह सही है। किसी भी अंग्रेज अदालत को मुझे हिरासत में रखने और सजा देने का अधिकार नही है। सेशन अदालत में मुकदमा बेहद संक्षिप्त था। "द टाइम्स " ने  लिखा," बचाव की ओर से कोई वकील नही था। गवाहों से कोई जिरह नही हुई। चीफ जस्टिस लॉर्ड एलिरस्टोन ने ढींगरा से पूछा," तुम किसी गवाह से सवाल करना चाहते हो ?" जबाब दो टूक नही में था। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि उन्हें और कुछ नही कहना है। ज्यूरी ने बहुत कम समय लिया। ब्रिटिश अदालतों के इतिहास का यह सबसे संक्षिप्त मुकदमा था। सिर्फ पैंतीस मिनट में कार्रवाई पूरी हुई और अभियुक्त को फांसी की सजा सुना दी गई। फांसी की तारीख 17 अगस्त 1909 तय की गई। 24 जुलाई 1909 के "द डेली टाइम्स " की सुर्खी थी,"ढींगरा को मरना होगा ; नाटकीय दृश्य : हत्यारे ने जज को धन्यवाद कहा।" अख़बार ने लिखा," धन्यवाद माई लार्ड। मुझे फिक्र नही। मुझे गर्व है कि मैं देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर रहा हूँ। इसके बाद ढींगरा नेअपना बायां हाथ जज के अभिवादन में उठा दिया।

मुकदमे की कार्रवाई के दौरान अदालत में ढींगरा के मित्रों को ही नही, किसी भारतीय को भी प्रवेश की इजाजत नही थी। जेल में ढींगरा के साथी टी. एस. राजन,एच. के. कोरगांवकर, वीर सावरकर, वी.वी.एस. अय्यर, जी.एस. खापर्डे और डॉक्टर पोलन उनसे समय-समय पर मिले। बचाव की हर पेशकश ढींगरा ने ठुकरा दी। ढींगरा के सगे भाई भजन लाल लन्दन की उस शोक सभा में शामिल हुए थे, जिसमे मदन लाल धींगरा के कृत्य की निन्दा की गई थी। बाद में भजन लाल जेल में उनसे मिलने गए। ढींगरा ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया।
लन्दन के पत्र-पत्रिकाओं में ढींगरा की फांसी की सजा को लेकर बहस छिड़ गई। “द रिव्यू ऑफ रिव्यू” और “लन्दन ईवनिंग गजट” में फाँसी की सजा को उम्र कैद में बदलने के स्वर उभरे। “द टाइम्स” का लहजा तल्ख़ और आक्रामक था। उसने इस हत्या की पूरी जिम्मेदारी सावरकर पर डाली। उधर जेल में बंद ढींगरा और बाहर उनके साथियों की दूसरी योजना थी।वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस केस को राजनीतिक नजरिये से प्रचारित कर रहे थे। वे अंतरराष्ट्रीय अदालत की नजीरों का हवाला दे रहे थे , जो राजनीतिक और हत्या की आम वारदात में फर्क करती हैं। ब्रिटिश सरकार और स्कॉटलैंड पुलिस ने इस केस से जुड़ी खबरों और खासतौर पर ढींगरा के बयान को दबाने और गोपनीय रखने की भरपूर कोशिश की। लेकिन फांसी के एक दिन पहले 16 अगस्त 1909 को अमेरिकन और आयरिश अख़बारों ने उन्हें चौंका दिया। ” चुनौती ” सुर्खी के साथ ढींगरा का बयान छपा,” संगीनों के साये में भारत को गुलाम बना रखा गया है। वहां युद्ध के हालात है। चूंकि निहत्थी जनता के लिए मुकाबला मुमकिन नही है, इसलिए मैंने अचानक हमला किया। मुझे बंदूक देने से इनकार कर दिया गया, इसलिए मैंने अपनी पिस्टल इस्तेमाल की। मेरी प्रार्थना है कि मैं उसी माँ की कोख से फिर जन्म लूँ और फिर बलिदान दूँ,। उसी पवित्र उद्देश्य के लिए, जब तक मिशन पूरा न हो जाये। वन्देमातरम।
” इंग्लिश मेल” अख़बार ने जेल अधिकारियों के हवाले से लिखा,” हमने इतना शरीफ़ कैदी नही देखा। उन्होंने अपने आखिरी दिन धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हुए बिताए। वह अपने कृत्य और उसके उद्देश्य की पवित्रता को लेकर आश्वस्त थे। वह मानते थे कि उन्होंने अपने देश का मान बढ़ाने का कार्य किया है। फांसी के दिन 17 अगस्त 1909 को पेंटनविले जेल के सामने भारी भीड़ जमा थी। इनमें थोड़े ही भारतीय थे। फांसी के इंतजार या फिर फांसी के लिए ले जाये जाते समय ढींगरा की मस्ती ने अंग्रेजों को विचलित कर दिया। ” द टाइम्स ” में क्रन्तिकारियों से हमदर्दी रखने वाली मिस अजेंस ने लिखा ,” मातृभूमि से इतना गहरा प्यार। रस्सियों से बंधे धींगरा से आखिरी इच्छा पूछी जाती है। जबाब में वन्देमातरम की गूंज सुनाई देती है। माँ! भारतमाता आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ। और उसने फांसी के फंदे को चूम लिया। फंदा पहनते समय भी वह गर्व से अपना मत्था ऊंचा किये हुए था। जल्लाद ने उसे सहारा देने की कोशिश की। उसने झटका। हुंकार भरी,” मैं मरने से नही डरता। गले में फाँसी का फंदा और उसने पूरी ताकत से अपने आखिरी शब्द कहे,” वन्देमातरम।” लन्दन के अखबार “न्यू ऐज” ने लिखा,” आने वाले दिनों में भारत उसे अपने नायक के तौर पर पूरी जिम्मेदारी के साथ याद करेगा। हमारी राय में यह सही होगा। भारत से ब्रिटिश राज के अंत की यह शुरुआत है।” कवि और लेखक डब्ल्यू. एस. ब्लंट राजनयिक सेवा में भी रहे। उन्होंने लिखा,” आज तक किसी ईसाई बलिदानी ने जज का इतनी निर्भीकता और गरिमा से सामना नही किया। भारत अगर ऐसे पांच सौ बहादुर सामने ला सके तो उसे आजाद होने से कोई रोक नही सकता।”ब्लंट ने विंस्टन चर्चिल के हवाले से लिखा,” फिर हम देर तक बैठे। कैबिनेट में बहुत देर तक ढींगरा की चर्चा हुई। लॉयड जॉर्ज ने ढींगरा की देशभक्ति की सबसे ज्यादा प्रशंसा की। कहा वह दो हजार साल तक याद किया जाएगा। चर्चिल ने भी ढींगरा के आखिरी शब्दों को दोहराते हुए कहा कि इसके पहले देशभक्ति प्रकट करने के लिए इतने अच्छे शब्द नही सुने गए।”
ढींगरा के शव प्राप्त करने और हिन्दू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार करने के उनके दोस्तों के प्रयास विफ़ल रहे। जेल में ही उनका शव दफना दिया गया। क्रन्तिकारियों के प्रयासों का प्रचार करने वाले पत्र ” इंडियन सोशियोलॉजिस्ट ” के प्रिंटर आर्थर. एफ. होर्सले पर मुकदमा चलाकर तीन महीने की सजा दी गई। प्रिंटर की अगली जिम्मेदारी लेने वाले एल्ड्रेड को धींगरा की फांसी के दिन छह महीने की सजा सुनाई गई। मदन लाल ढींगरा के बलिदान की गूंज से ब्रिटिश सरकार दहशत में आ गई। 23 सितम्बर 1909 को एक आदेश के जरिये ” द गाएलिक अमेरिकन” , ” द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट ” ,”स्वराज द इंडियन नेशनलिस्ट” ,”जस्टिस” और विनायक दामोदर सावरकर की भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष पर लिखी पुस्तक और पर्चों के भारत में वितरण पर रोक लगा दी गई।
….. और फिर। 31 साल बाद। वही पेंटनविले जेल। 31 जुलाई 1940। भारतमाता के एक और महान सपूत ऊधम सिंह ने फांसी का फंदा चूमा। फांसी के 34 साल बाद। जेल से ऊधम सिंह के अवशेष 1974 में भारत लाये गए। मदन लाल ढींगरा को तो भुला ही दिया गया था। ऊधम सिंह के अवशेषों की तलाश के दौरान मदन लाल ढींगरा के वहां दफ़न होने की जानकारी मिली। बलिदान के 67 साल बाद। आजादी के 29 साल बाद। 12 दिसम्बर 1976 को मदन लाल ढींगरा के अवशेषों को पवित्र मातृभूमि की उस मिट्टी का स्पर्श मिला जिसके लिए सिर्फ 26 साल की उम्र में उन्होंने जान दे दी थी। अकोला ( महाराष्ट्र) में अस्थिकलश को उनकी याद में स्थापित किया गया। परिवार ने जीते जी उन्हें छोड़ दिया था। फांसी की सजा के बाद एक भाई डॉक्टर बिहारी लाल को छोड़कर परिवार के अन्य सदस्यों ने अपने नाम से “ढींगरा” सरनेम भी हटा दिया। अमृतसर के पैतृक निवास को उनका स्मारक बनाने का प्रयास किया गया। इस अभियान से जुड़े लोगों ने समुचित मूल्य की भी पेशकश की। वंशजों ने उस मकान को अन्य लोगों को बेच दिया। ये लेख लिखते समय मेरे एक सहयोगी ने मुझसे पूछा था,” मदनलाल ढींगरा कौन थे?” काश! देश के लिए कुर्बान होने वाले मदन लाल ढींगरा जैसे तमाम महान क्रांतिकारी सपूतों को हम जान पाते..! उनकी यादें संजो पाते… !

सौरभ सिंह सोमवंशी

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