बंसी बजाता नीरो और उसकी धुन पर नाचने को मजबूर आंकड़े!

डॉ भुवनेश्वर गर्ग ।

आँकड़ों की बाजीगरी और कम्बल ओढ़ कर घी पीने में माहिर बाबूओं ने, एक बार फिर आसन्न चुनावों, त्योहारों और बाजार की रौनक बढ़ाने के मद्देनजर अपना शकुनि पांसा फेंक दिया है और संक्रमण के घटते आंकड़ों का झुनझुना जनता को पकड़ा दिया है, जबकि हकीकत में देखा जाए, तो आंकड़ों की इस बाजीगरी के पीछे ना सिर्फ कम हो रही जांचे हैं, अपितु करोना महामारी में, जागरूक और समझदार होती जा रही जनता खुद भी बीमारी की आशंका में अस्पतालों और जांच केंद्रों की और दौड़ लगाने की बजाय, घर में खुद को आइसोलेट कर, ठीक हो रही है और इसलिए संक्रमण के आंकड़ों में प्रतिबिम्बीय कमी की झलक तो है लेकिन हकीकत में स्थिति बेकाबू होने की कगार पर है। 
भारत देश में, जिस बीमारी में मौतों का आंकड़ा, संक्रमित मरीजों का लगभग डेढ़ प्रतिशत ही है, वहां घटते संक्रमण के आंकड़ों की तुलना में, मौतों के बढ़ते आंकड़े सारी सच्चाई बयां कर रहे हैं। अगर दुनिया भर के आंकड़ें देखें, तो पच्चीस सितम्बर को जहाँ ६३०० मौतें दर्ज हुई थीं, वहां तीन अक्टूबर को यह आंकड़ा ९००० हो गया था, और अगर भारत में २९ सितम्बर को सात सो मौतों हुई थीं तो एक अक्टूबर को १२०० मौतें दर्ज की गई हैं। 
लेकिन नीरो चैन की बंसी बजा रहा है और उसकी धुन पर आंकड़ें नाचने को मजबूर हैं, उसके प्यादों ने भेड़ों को घेर कर रखी गई बागडें तोड़ दी हैं, नतीजा? चुनाव, त्यौहार, आसन्न ठंडक का मौसम, बढ़ता एयर पोलूशन और सड़कों पर उमड़ती भीड़ बहुत शीघ्र ही इस बीमारी की दूसरी पीक वेव को ना सिर्फ निमंत्रण देती दिखाई देगी बल्कि इस बार मौतों का आंकड़ा भी दुगना तिगुना हो सकता है।क्योंकि ठण्ड और हवा पॉलुशन से ना सिर्फ सांस और फेफड़ों के मरीज बढ़ेंगे बल्कि रक्त नलिकाओं के थक्कों और हार्ट अटेक की घटनाओं में भी वृद्धि होगी। 
स्वाइन फ्लू की दस्तक के साथ ही तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री स्वर्गीय सुश्री सुषमा स्वराज की त्वरित कर्मठ कार्यशैली ने इस बीमारी को हवाई अड्डों से ही विदा कर दिया था, नतीजा विश्व में हाहाकार मचा देने वाली यह जानलेवा बीमारी भारत में अपने पैर पसार नहीं पाई थी, लेकिन स्वास्थ्य विभाग, WHO, दवा और अनुसंधान महकमें ने विगत नवम्बर माह से ही करोना संक्रमण के फैलते पंखों और पसरते पैरों में सुष्माई बेड़ियाँ डालने की जगह, कदम कदम पर गति ही प्रदान की है। हर मौके पर गलत और व्यापरिक निर्णय लेते नजर आये जिम्मेदार, बाबाओं और दवा माफियाओं के झूठे दावों पर ना सिर्फ शुतुरमुर्ग बने रहे बल्कि उनके अनर्गल और अनुचित निर्णयों की वजह से अकारण लाखों लोग असमय मौत का शिकार भी  हुए।
सन २००२ में आई कोविड बीमारी, स्वाइन फ्लू, की शुरुआत से लेकर मार्स, इबोला और अब करोना में एक सुस्थापित पैटर्न था, वायरस का जेनेटिक पैटर्न भी, फैलने का तरीका भी और उपचार का भी। मास्क, साफ़ सफाई और दूरी का नियम १९२० में फैले प्लेग में भी कारगर साबित हुआ था तो कोविड सीरीज के इन सभी वायरसों में भी। कोविड सीरीज के पहले वाले वायरसों में किसी भी दवा ने काम नहीं किया था और इसीलिए आज तक इनकी कोई स्थायी वेक्सीन भी नहीं बन पाई, लेकिन उन्ही दवाइयों को, दवा माफिया ने नया रंगरोगन कर फिर से जनता को लूटने, बाजार में उतार दिया, और हमारे महकमे, अपना हिस्सा उदरस्थ कर चेन की नींद सोते रहे, बाजारू कारपोरेट अस्पतालों ने मनमर्जी के नियम कानूनों के सहारे अच्छे अच्छे लोगों को संक्रमित दिखा कर, ना सिर्फ आंकड़ों का बलात्कार किया, बल्कि मानवता को भी अपने पैरों तले रोंद डाला!
आज सारी दुनिया देख रही है कि किस तरह चायना का प्रायोजित बाजारू वायरस झूठे मक्कार फर्जी बाबाओं और दानदाताओं की गोद में जा बैठा, बिल गेट्स के सारे दान आज सैकड़ों गुना होकर वापिस उसकी तिजौरी में जा बैठे हैं। यही नहीं, अनर्गल दवाओं और झूठे बाबाई दावों पर शुतुरमुर्ग बने बैठे महकमे के मुखिया भी फर्जी ख़बरों को हवा दे रहे हैं। 

डॉ भुवनेश्वर गर्ग  Email:drbgarg@gmail.com.facebook: https://www.facebook.com/bhuvneshawar.garg 

डॉक्टर सर्जन, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, हेल्थ एडिटर, इन्नोवेटर, पर्यावरणविद, समाजसेवक मंगलम हैल्थ फाउण्डेशन भारतसंपर्क: 9425009303.

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