कोरोना कहर : आपदा या मानवीय षड्यंत्र ?

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डॉ भुवनेश्वर गर्ग (एमबीबीएस, एमएस)

अब जबकि सारी बातें धीरे धीरे सामने आ रही हैं, तो ये भी अब दुनिया को समझ लेना चाहिए कि भारत के ब्रेन ड्रेन के वरदान से अभी तक बीमारी, निदान और दवा व्यापार पर अमेरिका का वर्चस्व था लेकिन हथियार उगाते उगाते अमेरिका कब अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए एशिया के बाजारों पर निर्भर हो गया ये उसके वाणिज्यिक विश्व पुरोधा समझ ही नहीं पाय या समझते हुए भी अनजान बने रहे ।

विश्व चिकित्सा बाजार दुनिया का सबसे धनी बाजार और व्यापार है और समय समय पर नई-नई बीमारियां और उनके निदान, उपचार पर अमेरिका के कानून सर्वोपरि थे फिर चाहे वो कोलेस्ट्रॉल को बुरा बताकर उसकी दवाइयां बेचना हो या बीपी को कम करते हुए उसकी दवाइयां देना, या रक्त शुगर की मात्रा को कम करते हुए उसकी दवाइयां खिलाना हो । लेकिन अब जब अमेरिकी प्रभुत्व को ख़तम करने और अपनी धाक जमाने के लिए चाइना ने भी वही रास्ता अपनाया तो उसने बड़ा घिनौना रूप अख्तियार कर लिया। इसी के तहत उसने वूहान लेब में इस वायरस कोविड १९ का व्यापारिक उत्पादन किया पर बुरे कर्मों का बुरा नतीजा, लिहाजा राजा के गंदे षड्यंत्रों का नजला उसी की बेगुनाह जनता पर ही उतरा। और वो पूरी दुनिया ने वूहान में देखा और भुगता ।

पर व्यापार का असल खेल तो अब शुरू हुआ है। वूहान में कितने मरे यह आज भी सवाल बना हुआ है, कोई कहता है डेढ़ लाख, कोई डेढ़ करोड़ ( आंकड़े सेटेलाइट थर्मल इमेज से सत्यापित भी किये गए हैं ) लेकिन यह एक निर्विवाद सत्य है कि वूहान शहर के नजदीक मौजूद चीन के बाकी शहरों में ये प्रकोप नहीं फैला और पूरी बेशर्मी से ना सिर्फ चीन अपनी धृष्टता दुनिया से छिपाता रहा बल्कि अपने देश में दवाइयों, मशीनों और अन्य अत्यावश्यक वस्तुओं का उत्पादन भी करता रहा। चालाक चीन ने धीरे-धीरे सारे यूरोप को ग्रसित कर अपने आगोश में ले लिया है । आस्ट्रेलिया और यूके ने लॉक डाउन भी घोषित कर दिया है। लेकिन धृष्ट चीन दुनिया को तुरंत जागरूक करने की जगह लीपापोती करता रहा और आज सारा विश्व सहमा और ठहरा पड़ा है। हर कोई इस बीमारी से घबराकर इसकी जांच करवाना चाहता है । कहाँ से आएँगी इसकी जांच किट ? कौन सक्षम है ? यकीनन चीन और वो तैयार भी बैठा है, आर्डर लेने और उसकी सप्प्लाई देने के लिए। अब स्पेन को ही देखिये करोना कहर के चलते अपने यहाँ हो रहे करोना संक्रमण ( लगभग पचास हजार मरीज) और उससे हो चुकी लगभग ४००० मौतों ( मात्र पिछले २४ घंटों में ७५० ) से घबरा कर सिर्फ साढ़े चार करोड़ की जनसँख्या वाले देश ने, चाइना को चार हजार करोड़ के चिकित्सा उपकरणों का आर्डर दिया है जिसमे मास्क, वेंटीलेटर, ग्लव्स, टेस्ट किट्स शामिल हैं।

यह तो एक बानगी है, आने वाले समय में बीमारी की विकरालता के चलते सारा विश्व चाइना के आगे नतमस्तक होगा। इस कदाचारित व्यापार में अमेरिका कहाँ है ? ट्रम्प के व्यापारिक गुण दुनिया को पता हैं। फिर ? जैसे ही ट्रम्प को आभास हुआ कि चाइना ने खेल कर दिया है और उसका षड्यंत्र दुनिया के सामने उजागर हो गया है तो ट्रम्प जी ने USFDA के अधिकारियों को सूचित किये बगैर विश्व पटल पर इस बीमारी के उपचार की दवाई “क्लोरोक्विन” की घोषणा कर दी ओर यह भी कह डाला कि हमने इसका वेक्सीन भी बना लिया है हालांकि USFDA के अधिकारियों ने तुरंत ही इसका खंडन भी कर दिया लेकिन हमारे देश के अतिउत्साहीलाल मुखोटे सरकारी अधिकारी ने नेशनल पटल पर इस दवाई को करोना की दवाई घोषित भी कर दिया, बिना ये सोचे समझे कि इसके कितने गंभीर दुष्परिणाम बच्चो, बूढ़ों बीमारों, गर्भवती महिलाओं पर हो सकते हैं और भीड़ दुकानों पर टूट पड़ सकती है। नतीजा दवा कंपनियों, डाक्टरों, अस्पतालों, दवा विक्रेताओं ने इसे तुरंत अपनी कमाई का जरिया बना लिया और मास्क, सेनेटाइजर, के साथ साथ यह दवा भी, जोकि मरीजों के लिए या उनकी तीमारदारी में जुटे लोगों के लिए जरुरी थी, मंहगी हो गई या बाजार से गायब हो गई ।

आज जब यह बीमारी अपने तीसरे स्टेज, सबसे गंभीर दौर, में पहुँच रही है तब जाकर आज इस दवा को भारत सरकार ने सामान्य जनता के लिए बैन किया है और दुकानों से इसकी बिक्री को प्रतिबंधित किया है लेकिन क्या यह पर्याप्त होगा? यह समय विकट भले ही है लेकिन भारत हमेशा संकट में जागने और लड़कर जीतने के लिए जाना जाता है और फिर इस वक्त तो देश की बागडोर कर्मठ देशभक्त वीर सेनापति के हाथ में है जिनका परचम पुरे विश्व में लहरा रहा है और उनका लोहा उनके दुश्मन भी मानते हैं तो फिर देर कहाँ है ? देर सिर्फ इस बात की है कि हमें अब उपभोक्ता नहीं उत्पादक बनना है और ध्यान दीजिये कि मोदीजी कब से मेक इन इंडिया पर जोर दे रहे हैं। आखिर सबसे बड़ी मेन पावर भी तो हैं हम। फिर कैसे हारेगा हिन्दुस्तान ? तो चलिए अलख जगाएं, भारत को एक बार फिर से सिरमौर बनाएं। बोलिये देंगे साथ सेनापति का। तो जोर से बोलिए भारत माता की जय ।

(लेखक भोपाल के गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय के वरिष्ठ चिकित्सक है)


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