अपराधी -सिस्टम’ गठजोड़ को तोड़ने से कतराती हैं सरकारें

सियासत और अपराध का संबंध बिल्कुल चोली दामन जैसा होता है। सियासत अपराध को कंधा बनाकर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरी करने की जुगत में होती हैं तो वहीं अपराधी नेताओं की चेला गिरी कबूल कर कानून के लंबे हाथ से बचे रहते हैं। सियासत का जैसे-जैसे अपराधीकरण हो रहा है ठीक वैसे ही अपराधियों को और नेताओं की परस्पर आवश्यकता भी बढ़ रही है।
कानपुर के विकास दुबे प्रकरण से सिस्टम- अपराधी गठजोड़ की चर्चाएं फिर से तेज हो गई है।
इस सिस्टम-अपराधी गठजोड़ को तोड़ने के लिए सरकारें चाहे तो बहुत कुछ कर सकती हैं मगर सियासत की महत्वाकांक्षा उन्हें यह करने से रोक देती है।सरकारें इस बात को अच्छी तरह जानती हैं कि अपराधी और सरकारी तंत्र के संयोग का उपयोग सियासत में कैसे किया जाएगा। सरकार किसी की हो मगर यह सिस्टम चलता रहता है, जिस की सरकार बनती है यह भ्रष्ट और अपराधियों को संरक्षण देने वाला सिस्टम उसी का हो जाता है।
आज से लगभग 3 वर्ष पहले यानी सन 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी से कई तल्ख सवाल किए थे। यह सवाल था अवैध रूप से बेहिसाब संपत्ति जुटा रहे राजनेताओं के खिलाफ सरकार की रहस्यमई चुप्पी पर।देश की सर्वोच्च न्याय पीठ ने सीबीडीटी द्वारा सौंपे हलफनामे पर विचार करते हुए को यह निर्देश भी दिया था कि सीबीडीटी को इस तथ्य की भी जांच आवश्यक रूप से करना चाहिए कि विधायकों और सांसदों की दौलत में बेहिसाब इजाफे पीछे कौन से कारण जिम्मेदार है।
आप दिमाग पर जरा सा जोर डालेंगे तो आपको सारे कारण साफ नजर आ जाएंगे।
‘राजनेताओं और अपराधियों का गठजोड़’ समाज का हर मोर्चे पर दोहन करता है।समाज का नुकसान पहुंचा कर अपराधी राजनेता को फायदा पहुंचाता है तो वहीं राजनेता भी सामाजिक मूल्यों की तिलांजलि देकर अपने शागिर्द अपराधी की हर संभव मदद करता है। बावजूद इसके नेताओं और अपराधियों की इस गठजोड़ को तोड़ने की जोखिम उठाने से सरकारी कतराती क्यों है जबकि इस गठजोड़ का तोड़ आज से 27 साल पूर्व हुई खोज लिया गया था।
साल था 1993, दिल्ली की गद्दी पर नरसिम्हा राव की थी , मुंबई में सिलसिलेवार तरीके से विस्फोट हुआ। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक इस धमाके में 257 लोगों की जानी गई और हजार करीब लोग घायल हुए। खुफिया और जांच एजेंसियों ने मेनन और दाऊद इब्राहिम गैंग की गतिविधियों और संबंधों को लेकर एक रिपोर्ट दी। जांच एजेंसियों द्वारा सौंपी रिपोर्ट के बाद नरसिम्हा राव ने तत्कालीन गृह सचिव ए एन बोहरा के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया जिसका काम अपराधियों राजनेताओं और सिस्टम में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों के बीच संबंधों का खुलासा करना था, समिति ने ईमानदारी से काम किया और नेताओं अधिकारियों और अपराधियों के इस त्रिगुट की पारस्परिक अवैध संबंधों का ना केवल खुलासा किया बल्कि इनका तोड़ भी बताया। बोहरा समिति की रिपोर्ट सरकारी सिस्टम को बेनकाब करने वाली थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि समिति की रिपोर्ट को अभी तक लागू करने की बात तो दूर पूरी तरह सार्वजनिक भी नहीं किया गया। साल 1995 में सरकार पर दबाव पड़ने के बाद 100 पन्नों की इस रिपोर्ट में से केवल 12 पन्ने ही सार्वजनिक किया गया। और इन 12 पन्नों की रिपोर्ट भी सरकार और सिस्टम की काली करतूतों को उजागर करती थी।1997 में केंद्र सरकार पर रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का दबाव और बढ़ा तो केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय की शरण में चली गई इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने रिपोर्ट सार्वजनिक करने की सरकारी बाध्यता को खत्म कर दी।
साल 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही उनसे भी वोहरा समिति रिपोर्ट सार्वजनिक करने की अपील की गई मगर नतीजा सिफर रहा।
वोहरा समिति ने गूढ़ विमर्श के बाद सिफारिश की थी कि सरकार नोडल एजेंसी की तरह एक विशेष संस्था बनाए जो नियमित तौर पर अपराधियों के मामले में जानकारी जुटाए और इनके खिलाफ केस को आगे बढ़ाएं। समिति ने इस बात पर जोर दिया कि एजेंसियां गोपनीयता के साथ काम करें तो निश्चित रूप से माफियाओं और उन को संरक्षण देने वाले सिस्टम में बैठे अधिकारियों की कमर टूटेगी।
विकास दुबे प्रकरण के बाद इस मुद्दे पर भले ही चर्चाएं छिड़ी है मगर ये उम्मीद न के बराबर है कि सरकार वोहरा समिति की सिफारिशों की तरफ तनिक भी ध्यान देगी। बात केवल योगी या बीजेपी सरकार की नहीं है, बल्कि किसी सरकार की हो , ये सियासी महत्वाकांक्षा सरकार से ‘अपराधी- सिस्टम’ को बनाए रखने की अपील करती है।

नीलेश सिंह
स्वतंत्र पत्रकार

लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं जो विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर लेखन करते हैं।)

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