अखिलेश यादव विपक्ष की स्थित के जिम्मेदार?

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सौरभ सिंह सोमवंशी, लखनऊ: उत्तर प्रदेश ब्यूरो प्रमुख।

नकारात्मक सोच के साथ किया गया कोई भी कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता है, 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने तमाम सारे राजनीतिक दलों के साथ एक गठबंधन किया और उस गठबंधन का उद्देश्य समाजवादी पार्टी या अखिलेश यादव को सत्ता में लाने से कहीं अधिक इस बात को लेकर था कि किसी भी तरह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार जिसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं उसको सत्ता से हटाना है ।
इस गठबंधन की ना तो कोई नीति थी ना कोई रीति थी ना ही कोई प्रोग्राम और न ही पालिसी ।
उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह ने एक टीवी डिबेट के दौरान कहा कि 1992 में जब समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई तब से लेकर मुलायम सिंह यादव ने एक सिद्धांत यह बनाए रखा कि वह भाजपा और कांग्रेस से बराबर दूरी बनाए रखेंगे और उन्होंने इसका पालन भी किया। परंतु अखिलेश यादव ने उसी कांग्रेस से गठबंधन कर लिया सुरेश बहादुर सिंह ने कहा कि सत्ता येन केन प्रकारेण प्राप्त करना राजनीति नहीं है राजनीति विचारों से, सिद्धांतों से और गरीब जनता के बीच जाकर अपनी कार्यक्रम योजनाओं को बताने से प्राप्त होती है। डिबेट के दौरान वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी ने कहा कि अखिलेश यादव गठबंधन धर्म को भूलकर मुताह विवाह की स्थिति में आ जाते हैं जो एक तरह का समझौता होता है परिणाम यह होता है कि वह अधिक दिनों तक नहीं चल पाता इसी तरह से अखिलेश यादव ने 2019 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में सर्वाधिक मारक गठबंधन कहा जाने वाला गठबंधन किया जिसमें उन्होंने बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन किया उन्होंने गेस्ट हाउस कांड को भूल कर वह गठबंधन किया जिसको उत्तर प्रदेश की राजनीति में पश्चिम से सूरज के निकलने की बात कहा जाता है उसके बावजूद वह पश्चिम से सूरज ना उदय कर सके और उस गठबंधन का कोई भी फायदा अखिलेश यादव को नहीं हुआ भले ही बसपा को हुआ हो।
हेमंत तिवारी ने कहा कि अखिलेश यादव ये भूल गए कि 2012 के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद उनको सजी सजाई थाली मिली भले ही उनसे ज्यादा योग्य और अनुभवी उनके चाचा शिवपाल यादव थे परंतु उसके बाद अखिलेश यादव लगातार चुनाव हारते चले गए और आज परिस्थिति ऐसी आ गई है कि उत्तर प्रदेश में लगभग हर राजनीतिक दल के साथ वह गठबंधन कर चुके हैं और गठबंधन टूट भी चुका है।

ओम प्रकाश राजभर को बेटों के भविष्य की चिंता

वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह ने कहा कि कोई भी राजनीतिक दल जब अपने से बड़े राजनीतिक दल के साथ गठबंधन करता है तो वह चाहता है कि उसे कुछ लाभ होगा। ओमप्रकाश राजभर को अखिलेश यादव के साथ गठबंधन करने से कोई फायदा नहीं हुआ। भले ही अखिलेश यादव को हुआ हो क्योंकि आजमगढ़, गाजीपुर और अंबेडकरनगर जिन 3 जनपदों में भारतीय जनता पार्टी का खाता नहीं खुला वहां पर राजभर वोटरों की संख्या पर्याप्त है। इसके बावजूद ओमप्रकाश राजभर को अहमियत ना देना अखिलेश यादव की नासमझी है। उन्होंने कहा कि संजय निषाद खुद कैबिनेट मंत्री हैं उनके दो बेटों में एक सांसद और एक विधायक है दूसरी तरफ ओमप्रकाश राजभर के भी दो बेटे हैं इस तरह से ओमप्रकाश राजभर को अब याद आ रहा होगा जब वह भारतीय जनता पार्टी के साथ थे तब कहां थे और आज वह कहां हैं?

लोकसभा चुनाव में मुसलमान सपा से ज्यादा कांग्रेस पर भरोसा करता है

अखिलेश यादव को भले ये लगता हो कि समाजवादी पार्टी के साथ उत्तर प्रदेश का मुसलमान है परंतु मुसलमान जिस मूल भावना के साथ मतदान करता है वह भावना भारतीय जनता पार्टी को हराने की होती है और निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ही भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ सीधा मैदान में थी, परंतु जब लोकसभा चुनाव की बात आती है तो भारतीय जनता पार्टी को टक्कर देती हुई सिर्फ और सिर्फ कांग्रेश दिखती है। अल्पसंख्यक समुदाय को यह भी पता होता है कि समाजवादी पार्टी चाहे जितनी सीटें हासिल कर ले सरकार में वह सिर्फ और सिर्फ सहयोगी की भूमिका में ही होगी जो कांग्रेस के नेतृत्व में ही रहेगी। इस तरह से मुसलमान वोटरों का रुझान लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी से ज्यादा कांग्रेस तरफ रहने के आसार होते हैं वहीं हेमंत तिवारी ने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में ओमप्रकाश राजभर की स्थिति देखकर यह पता चल गया है कि वह आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी के साथ जा सकते हैं और निश्चित रूप से अखिलेश यादव ओमप्रकाश राजभर का उपयोग कर पाए हो या ना कर पाए हैं परंतु भारतीय जनता पार्टी ओमप्रकाश राजभर का भरपूर उपयोग करेगी।


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